ट्रंप की चीन यात्रा पर क्या कहता है ईरानी मीडिया
तेहरान । डेस्क: तेहरान टाइम्स के हवाले से यह खबर है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा वैश्विक कूटनीति के एक ऐसे मोड़ पर हो रही है, जहाँ ईरान संघर्ष का साया पूरी तरह से हावी है. बुधवार रात बीजिंग पहुंचने पर चीनी उपराष्ट्रपति हान झेंग द्वारा ट्रंप का स्वागत किया जाना इस बात का संकेत है कि चीन कूटनीतिक शिष्टाचार का पालन तो कर रहा है, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता के मुद्दे पर दोनों महाशक्तियों के बीच गहरी खाई बरकरार है.
ईरानी मीडिया के अनुसार, ट्रंप ने वाशिंगटन से प्रस्थान करने से पहले राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ईरान संघर्ष पर 'लंबी बातचीत' की इच्छा जताई थी, लेकिन साथ ही यह अहंकार भी दिखाया कि अमेरिका को किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं है. हालांकि, उनके अपने कैबिनेट का रुख इससे अलग है. विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने चीन से ईरान पर दबाव बनाने का आग्रह किया है, जबकि ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने स्वीकार किया है कि इस शिखर सम्मेलन के एजेंडे में ईरान का मुद्दा सबसे ऊपर है.
ईरानी मीडिया इस यात्रा को 6 मई को ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची की बीजिंग यात्रा के संदर्भ में देख रहा है. अरागची और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई उच्च स्तरीय बातचीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तेहरान और बीजिंग के बीच रणनीतिक तालमेल और मजबूत हुआ है. ईरान ने मध्य पूर्व के लिए चीन के चार सूत्री शांति प्रस्ताव का समर्थन किया है, जो संप्रभुता के सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर आधारित है.
वांग यी ने तेहरान को अलग-थलग करने की अमेरिकी अपीलों को खारिज करते हुए एक स्थायी और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की आवश्यकता पर बल दिया है. ईरानी दृष्टिकोण से, यह अमेरिका की उस नीति की विफलता है जिसमें वह ईरान को वैश्विक स्तर पर अकेला करना चाहता था.
युद्ध के वर्तमान स्वरूप पर चर्चा करते हुए तेहरान टाइम्स लिखता है कि यह संघर्ष अब 'नाकाबंदी कूटनीति' के चरण में प्रवेश कर चुका है. होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान का परिचालन नियंत्रण बढ़ गया है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हुई है और कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं.
ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह तब तक बातचीत नहीं करेगा जब तक वाशिंगटन उसकी पांच मुख्य मांगें पूरी नहीं करता, जिनमें लेबनान सहित सभी मोर्चों पर शत्रुता समाप्त करना, प्रतिबंध हटाना और जब्त की गई ईरानी संपत्ति को मुक्त करना शामिल है. ईरानी मीडिया का मानना है कि ट्रंप के लिए यह स्थिति घरेलू स्तर पर भी जोखिम भरी है, क्योंकि तेल की बढ़ती कीमतों से पैदा हुई मुद्रास्फीति उनकी आर्थिक नीतियों के लिए खतरा बन गई है.
रणनीतिक स्तर पर ईरानी मीडिया का विश्लेषण है कि अमेरिका ने शुरुआत में सोचा था कि ईरान का हाल भी वेनेजुएला जैसा होगा और वहां की व्यवस्था ढह जाएगी, लेकिन ईरान के सैन्य लचीलेपन ने इन मंसूबों पर पानी फेर दिया है. रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि अगर अमेरिका ईरान पर किसी भी तरह की बढ़त हासिल करता है, तो वह अपनी पूरी शक्ति चीन के खिलाफ ताइवान जैसे मुद्दों पर लगा देगा.
इसलिए, चीन के लिए यह अनिवार्य है कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान का समर्थन जारी रखे. अंततः, ईरानी मीडिया की नजर में सवाल यह नहीं है कि अमेरिका जीतता है या हारता है, बल्कि यह है कि क्या चीन एक रचनात्मक मध्यस्थ के रूप में उभरकर अमेरिका के एकतरफा प्रभुत्व को चुनौती दे पाता है. इस युद्ध का परिणाम न केवल मध्य पूर्व बल्कि भविष्य के वैश्विक शक्ति संतुलन को भी निर्धारित करेगा.