बंगाल में धार्मिक आधार पर मिलने वाली सरकारी मदद बंद
कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल की नवगठित सुवेंदु अधिकारी सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में कई बड़े और कड़े फैसले लेकर राज्य की सियासत में बड़े बदलाव के संकेत दे दिए हैं. सरकार ने स्पष्ट किया है कि अब राज्य में किसी भी कल्याणकारी योजना का लाभ धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं दिया जाएगा. इस नीति के तहत, आगामी जून महीने से धार्मिक आधार पर दी जाने वाली सभी सरकारी सहायता पूरी तरह बंद कर दी जाएगी.
कैबिनेट बैठक के बाद फैसलों की जानकारी देते हुए मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने बताया कि सूचना एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग और अल्पसंख्यक मामले व मदरसा शिक्षा विभाग द्वारा चलाई जा रही ऐसी योजनाएं केवल इस महीने के अंत तक ही प्रभावी रहेंगी. इसके बाद इन्हें रोक दिया जाएगा और इस संबंध में जल्द ही अलग से अधिसूचना जारी होगी.
यह फैसला राज्य की पूर्ववर्ती तृणमूल सरकार की उन नीतियों को पूरी तरह पलट देता है, जिसके तहत साल 2012 से इमामों और मुआज्जिमों को तथा साल 2020 से हिंदू पुरोहितों को मासिक भत्ता दिया जा रहा था.
इसके साथ ही, कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक पुराने आदेश का पालन करते हुए कैबिनेट ने राज्य की मौजूदा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सूची को भी रद्द करने का निर्णय लिया है. सरकार अब कोटा पात्रता की नए सिरे से समीक्षा करने और इसे तय करने के लिए एक विशेष पैनल का गठन करेगी.
पुरानी सरकार के कामकाज और महिला उत्पीड़न की होगी जांच
धार्मिक भत्तों को बंद करने के अलावा, नई सरकार ने ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए कामकाज और वित्तीय विसंगतियों की जांच का भी खाका तैयार कर लिया है. पूर्ववर्ती सरकार के समय फंड वितरण में हुई कथित अनियमितताओं और संस्थागत भ्रष्टाचार की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति बिस्वजीत दास की देखरेख में एक आयोग बनाया गया है.
इसके अतिरिक्त, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने राज्य में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों और उत्पीड़न के मामलों की गंभीरता से जांच के लिए एक अन्य उच्च स्तरीय समिति की घोषणा की है. सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति समाप्ति चटर्जी के नेतृत्व में गठित इस समिति में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी दमयंती सेन को सदस्य सचिव नियुक्त किया गया है. मुख्यमंत्री ने बताया कि इस समिति से एक महीने के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है.