हमें नागरिकों के बजाय प्रजा के रूप में देखा जा रहा है- हर्षमंदर
भुवनेश्वर । डेस्क: पूर्व आईएएस, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और स्तंभकार हर्षमंदर ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को निरस्त करने के केंद्र सरकार के फैसले की कड़ी आलोचना की है. लोहिया अकादमी में आयोजित एक सार्वजनिक चर्चा में उन्होंने इस कदम को "गरीब विरोधी" करार देते हुए कहा कि यह करोड़ों ग्रामीण श्रमिकों की कीमत पर मुट्ठी भर उद्योगपतियों को लाभ पहुँचाने वाला निर्णय है.
उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह देश सबका है, न कि केवल अडानी और अंबानी जैसे कुछ उद्योगपतियों का.
हर्षमंदर ने मनरेगा को स्वतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक कानूनों में से एक बताया, जो महिलाओं के सशक्तिकरण और ग्रामीण बाजारों को जीवंत बनाने में सहायक था. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मनरेगा ने ग्रामीण श्रमिकों को सम्मानजनक श्रम और वित्तीय स्वतंत्रता प्रदान की थी, लेकिन इसके निरस्त होने से गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों की आजीविका छीन ली गई है.
उन्होंने याद दिलाया कि सम्मान के साथ जीने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है. इसके अलावा, उन्होंने स्थानीय निकायों (पंचायतों) से निर्णय लेने की शक्ति छीनकर केंद्र को सौंपने की भी आलोचना की, जिससे स्थानीय विकास में लोगों की भागीदारी समाप्त हो जाएगी.
हर्षमंदर ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने वर्षों से इस योजना के फंड में कटौती और देरी करके इसे व्यवस्थित रूप से कमजोर किया है. उन्होंने इस कानून का नाम बदलकर 'विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025' करने पर सवाल उठाते हुए पूछा कि गांधी के नाम से इतनी नफरत क्यों है?
उन्होंने आरोप लगाया कि आरएसएस और मौजूदा सत्ता महात्मा गांधी की समावेशी विचारधारा के प्रति गहरा द्वेष रखते हैं. मंडेर ने अंत में लोगों से सरकार के इस कदम के खिलाफ आवाज उठाने की अपील करते हुए कहा कि हमें अब नागरिकों के बजाय प्रजा के रूप में देखा जा रहा है, जो देश का दुर्भाग्य है.