पाताल पहुंचा पानी, बेहाल छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ में गहराता जल संकट और पाताल में पहुंचता पानी, त्राहिमाम
रायपर | आयुषी शर्मा : छत्तीसगढ़ का पानी पाताल में जा रहा है. भूजल के लगातार दोहन के कारण राज्य के कई इलाके सूखे की चपेट में हैं.
बेमेतरा ज़िले का हाल सबसे बुरा है. भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि इस जिले के नवागढ़, बेमेतरा और बेरला विकासखंड देश के उन इलाकों में शामिल हो चुके हैं, जो पानी के लिहाज से संकटग्रस्त स्थिति में हैं.
ऐसे इलाकों में रायपुर और बालोद ज़िले के विकासखंड भी शामिल हैं.
औद्योगिक घरानों द्वारा ज़मीन से हज़ारों फुट नीचे पाइप डाल कर बेतहाशा पानी निकालने का मसला हो या खेतों में दिन-रात पानी उगल रहे पंप हों, ज़मीन के भीतर का पानी अब सूखता जा रहा है.
भूजल को उलीचते चले जाने और वर्षा जल को न सहेजने का नतीजा ही है कि छत्तीसगढ़ की हालत खराब होती जा रही है.
केन्द्रीय भूजल रिपोर्ट 2024 के मुताबिक राज्य के 146 विकासखंडों में से 5 को ‘क्रिटिकल’ और 21 को ‘सेमी-क्रिटिकल’ श्रेणी में रखा गया है, जो साफ दर्शाता है कि यहां भूजल दोहन और पुनर्भरण के बीच संतुलन नहीं बन पा रहा है.
बेमेतरा ज़िले के नवागढ़, बेमेतरा और बेरला इलाके को भारत सरकार ने पानी के लिहाज से क्रिटिकल श्रेणी में रखा है, उसी तरह बालोद ज़िले का गुरुर और रायपुर ज़िले का धरसींवा भी ऐसे ही विकासखंडों में शुमार हो चुका है.
राज्य के 146 विकासखंडों में से केवल 38 ऐसे हैं, जहां भूजल दोहन 30 प्रतिशत से कम है, यानी यहां पानी का उपयोग संतुलित रूप से किया जा रहा है.
वहीं 29 विकासखंड ऐसे हैं, जहां 30 से 50 प्रतिशत के बीच भूजल का दोहन हो रहा है. सबसे अधिक संख्या उन 49 विकासखंड क्षेत्रों की है. जहां भूजल दोहन 50 से 70 प्रतिशत के बीच है.
चिंता की बात यह है कि 30 विकासखंड ऐसे हैं, जहां भूजल दोहन 70 प्रतिशत से अधिक हो चुका है.
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि राज्य के एक बड़े हिस्से में जमीन के नीचे का पानी तेजी से खाली होता जा रहा है.
राज्य का औसत भूजल दोहन 49.58 प्रतिशत दर्ज किया गया है, जो एक चेतावनी है कि यदि जल प्रबंधन को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में हालात और बदतर हो सकते हैं.
भयावह ये है कि यह स्थिति उस छत्तीसगढ़ में है, जहां औसत बारिश 1266.9 मिमी होती है.
इसके बावजूद भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, क्योंकि बारिश के पानी को संचित करने और भूजल पुनर्भरण करने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो पा रही है.
ज़मीनी स्तर पर सरकारी योजनाओं और प्रयासों का असर बेहद सीमित है, जो आने वाले समय में पानी के भयावह संकट की ओर इशारा करता है.
गर्मी ने अभी दस्तक दी ही है और छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में जलसंकट गहराने लगा है. कई जिलों में जलाशय सूखने लगे हैं.
हैंडपंप जवाब देने लगे हैं, तालाबों में पानी का नामोनिशान नहीं बचा है. भूजल स्तर तेज़ी से गिरता जा रहा है, जिससे लोगों को पेयजल के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है. हालात ऐसे हैं कि कई गाँवों और कस्बों में अभी से पानी के लिए त्राहिमाम मचा हुआ है.अभी से जल संकट, भविष्य की चेतावनी
अभी अप्रैल शुरू ही हुआ है और छत्तीसगढ़ के लगभग हर हिस्से से जलसंकट की खबरें आ रही हैं. चाहे कोरबा का बांगो बांध हो, या बस्तर की इन्द्रावती नदी, दोनो सूखने के कगार पर हैं. बिलासपुर, कवर्धा, पंडरिया, राजनांदगांव, बस्तर, खैरागढ़ सहित कई इलाकों में लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं.
अधिकांश इलाकों में एक जैसी बात है कि इस तरह का जल संकट मई-जून के महीने में आता था. लेकिन इस बार मार्च-अप्रैल से ही जंल संकट शुरु हो चुका है.ऐसे में मई-जून के हालातों का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है. मौजूदा जल संकट भविष्य की चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है.राजधानी भी चपेट में
राजधानी रायपुर में भी अभी से ही पेयजल संकट ने दस्तक दे दी है. शहर के कई इलाकों में पानी की कमी को लेकर हड़कंप मचा हुआ है.
आमानाका, डूमरतालाब, सड्डू जैसे क्षेत्रों में बोरवेल के खराब हो जाने से लोग परेशान हैं.
डब्लूआरएस कॉलोनी जैसे क्षेत्र में भी लोग जल संकट से जूझ रहे हैं. रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है, जिससे लोगों में नाराजगी है.
सिंचाई के अभाव में मवेशियों के हवाले फसल
राजधानी रायपुर से करीब 31 किलोमीटर दूर स्थित नगर पंचायत अभनपुर और इसके आसपास के करीब 10 गाँव जल संकट की मार झेल रहे हैं.
जिससे किसानों और ग्रामीणों की चिंताएं बढ़ गई हैं. खारून नदी पर बने स्टॉप डैम पर इन गाँवों की जलापूर्ति निर्भर है, लेकिन इस बार डैम लगभग सूखा पड़ा है.
नतीजतन, न तो सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल पा रहा है और न ही घरेलू जरूरतों के लिए.
ट्यूबवेल भी धीरे-धीरे बंद होने के कगार पर हैं. स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कुछ किसानों ने अपनी फसलों को मवेशियों के हवाले कर दिया है, क्योंकि सिंचाई की कोई उम्मीद ही नहीं बची है.
300 फुट में भी पानी नहीं
कबीरधाम जिले के पंडरिया और कवर्धा विकासखंड में मनरेगा योजना के तहत पिछले चार वर्षों में भू-जल संवर्धन को लेकर लगभग 2.36 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं.
इसके बावजूद, पंडरिया ब्लॉक जल संकट के मामले में बेहद चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुका है.
चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे ज़िले में भू-जल संरक्षण और रिचार्ज के सबसे अधिक काम पंडरिया विकासखंड में ही कराए गए हैं.
इसके बावजूद यहां का भू-जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है. जानकारों के मुताबिक, वर्तमान में पानी की सतह 120 फीट से भी नीचे पहुंच गई है.
फिर भी जिन इलाकों में 300 फीट तक बोरवेल की खुदाई करवाई गई है, वहां भी पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है.
इस गहराते संकट ने ग्रामीणों की दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है और अब इलाके में स्थायी जल समाधान की मांग तेज़ होती जा रही है.
कोरबा के बांगो बांध में भी संकट के बादल
कोरबा जिले में भी इस साल जलाशयों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. आज की तारीख़ में जिले के 40 जलाशयों में औसतन केवल 25 प्रतिशत ही पानी है.
यह स्तर सामान्य से काफी कम है. सबसे बड़े बांगो बांध की बात करें तो इसमें मात्र 36.81 प्रतिशत पानी बचा है, जो पिछले चार वर्षों में सबसे कम स्तर पर पहुंच गया है.
करतला ब्लॉक के सात जलाशयों में पानी का स्तर और भी कम है. यहां सिर्फ 11 प्रतिशत ही जल भराव हो पाया है.
वहीं, कोरबा विकासखंड के दो जलाशयों में महज 12 प्रतिशत पानी मौजूद है.
बिलासपुर में भी हालात खराब
बिलासपुर जिला इस बार भी जल संकट की मार झेल रहा है और आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है.
मौसम विभाग ने इस साल भीषण गर्मी पड़ने के संकेत दिए हैं, जिससे चिंता और बढ़ गई है.
तेज गर्मी के चलते पानी की खपत लगातार बढ़ेगी और इससे भूजल स्तर में और ज्यादा गिरावट आने की संभावना है.
जिले के बिल्हा और मस्तुरी ब्लॉकों को पहले से ही सेमी-क्रिटिकल श्रेणी में रखा गया है.
इसके अलावा, तखतपुर और कोटा ब्लॉक के ग्रामीण क्षेत्रों में भी भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है.
कई गांवों में हैण्डपंप पूरी तरह सूख चुके हैं, जिससे लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पानी जुटाना मुश्किल होता जा रहा है.
जिले भर में जल संरक्षण को लेकर गंभीर प्रयासों की ज़रूरत महसूस की जा रही है.
खर्च के बावजूद समस्या जस की तस
अधिकांश ज़िलों में प्रशासन, गर्मी शुरू होने से पहले ही पेयजल आपूर्ति के मामले में हांफ रहा है.
दावा किया गया था कि लोगों को पेयजल के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा. मगर सरकार के लिए तो दावे करना कोई नयी बात नहीं है.
अलग-अलग शहरों में स्मार्ट सिटी और अमृत मिशन योजना में टंकी बनाने, पाइप बिछाने में हजारों करोड़ खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन इन योजनाओं का पानी भी लोगों की प्यास नहीं बुझा पा रहा है.
राजधानी से लेकर दूर गांव तक, हर ओर पानी को लेकर त्राहि-त्राहि मची है और सरकार की योजनाएं कागजों पर ही 'झरने' की तरह बहती दिख रही हैं.
हम सब जानते हैं कि कागज़ों का पानी, हकीकत में किसी की प्यास कहां बुझा सकता है?