युद्ध और अमेरिकी नाकेबंदी ने चरमराई ईरान की अर्थव्यवस्था
तेहरान । डेस्क: पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य संघर्ष और अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी ने ईरान की अर्थव्यवस्था को एक ऐसे भंवर में धकेल दिया है, जिससे निकलना फिलहाल नामुमकिन नजर आ रहा है. ईरान की राष्ट्रीय मुद्रा 'रियाल' ने बुधवार को गिरावट के तमाम पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए, जिससे देश के भीतर आर्थिक हाहाकार मच गया है.
बुधवार दोपहर तक खुले बाजार में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 1.81 मिलियन (18.1 लाख) रियाल तक जा पहुंची. यह गिरावट कितनी भयावह है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज एक साल पहले रियाल की कीमत 8,11,000 प्रति डॉलर थी. युद्ध के साये में जीने को मजबूर ईरानी नागरिकों के लिए यह मुद्रा संकट अब उनके दैनिक अस्तित्व पर संकट बनकर मंडरा रहा है.
रियाल की गिरती साख ने ईरान के घरेलू बाजारों में अनियंत्रित मुद्रास्फीति को जन्म दिया है. पिछले दो महीनों से अपेक्षाकृत स्थिर रहने वाली मुद्रा उस समय धराशायी हो गई जब फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल के साथ सीधे युद्ध की शुरुआत हुई.
हालांकि सरकार ने कुछ हस्तक्षेप के बाद मुद्रा को आंशिक रूप से संभालने की कोशिश की है, लेकिन युद्ध की अनिश्चितता और संसाधनों की कमी ने प्रबंधन को पंगु बना दिया है. आम ईरानी परिवारों के लिए बुनियादी वस्तुओं की कीमतें अब उनकी पहुंच से बाहर होती जा रही हैं.
सरकार ने इस संकट को थामने के लिए अपने सॉवरेन वेल्थ फंड से एक अरब डॉलर निकालने का फैसला किया है ताकि विदेशों से भोजन और जरूरी सामान खरीदा जा सके, लेकिन रियाल की घटती क्रय शक्ति ने इन राहत उपायों के असर को सीमित कर दिया है.
नौसैनिक नाकेबंदी और व्यापारिक अलगाव
ईरान की अर्थव्यवस्था के चरमराने का सबसे बड़ा कारण अमेरिका द्वारा लागू की गई सख्त नौसैनिक नाकेबंदी है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उनका उद्देश्य ईरान के दक्षिणी जलक्षेत्र से होने वाले आयात और निर्यात को पूरी तरह से ठप करना है. वर्तमान में इस क्षेत्र में तीन अमेरिकी विमान वाहक पोत तैनात हैं, जो ईरान की आर्थिक धमनियों को चोक कर रहे हैं.
इस नाकेबंदी के कारण ईरान का विदेशी व्यापार, जो कभी इसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करता था, अब लगभग पूरी तरह से कट गया है. सीमा शुल्क विभाग के आंकड़े बताते हैं कि युद्ध शुरू होने के बाद से गैर-तेल व्यापार में करीब 50 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है.
होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर अमेरिकी नियंत्रण ने ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजार से अलग-थलग कर दिया है.
बुनियादी ढांचे पर प्रहार और औद्योगिक पतन
अमेरिकी और इजरायली हमलों ने केवल सैन्य ठिकानों को ही निशाना नहीं बनाया है, बल्कि ईरान के नागरिक बुनियादी ढांचे को भी बड़े पैमाने पर क्षति पहुंचाई है. हवाई हमलों में ईरान के प्रमुख बंदरगाहों, रेलवे नेटवर्क, बिजली स्टेशनों और औद्योगिक क्षेत्रों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया है.
इस्पात और पेट्रोकेमिकल जैसे प्रमुख उत्पादक संयंत्र अब मलबे में तब्दील हो चुके हैं. अमेरिकी प्रशासन की रणनीति ईरान को तकनीकी और औद्योगिक रूप से दशकों पीछे धकेलने की है.
अपनी आंतरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ईरान को मजबूरन इस्पात और पॉलिमर जैसे उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा है, जिससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह पूरी तरह से रुक गया है.
तेल निर्यात पर चौतरफा हमला
ईरानी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे घातक प्रहार उसके तेल क्षेत्र पर हुआ है. अमेरिका ने अपने सैनिकों को उन जलमार्गों पर तैनात किया है जहां से ईरानी तेल का परिवहन होता है. ईरान के 'शैडो फ्लीट' (गुप्त टैंकरों) को नष्ट करने के साथ-साथ अब उन विदेशी रिफाइनरियों पर भी शिकंजा कसा जा रहा है जो ईरानी कच्चा तेल खरीदती हैं.
चीन, जो ईरान के तेल का 90 प्रतिशत हिस्सा खरीदता था, अब अमेरिकी प्रतिबंधों और बैंकिंग चैनलों पर बढ़ती निगरानी के कारण अपने हाथ पीछे खींचने लगा है. आंकड़ों के अनुसार, चीन और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार में पिछले साल के मुकाबले 50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है.
अमेरिका अब ईरान के डिजिटल वित्तीय चैनलों और क्रिप्टोकरेंसी नेटवर्कों को भी निशाना बना रहा है ताकि ईरानी शासन के लिए धन जुटाने के सभी रास्ते बंद किए जा सकें.
क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव और नई चुनौतियां
युद्ध ने ईरान के क्षेत्रीय व्यापारिक संबंधों को भी पूरी तरह बदल दिया है. संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), जो कभी ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था, अब पूरी तरह से दुश्मन पाले में खड़ा नजर आता है. अब्राहम समझौते और ईरानी मिसाइल हमलों के बाद यूएई ने अपने यहां काम कर रहे ईरानी संस्थानों को बंद कर दिया है और ईरानी नागरिकों को देश छोड़ने का आदेश दिया है.
इस कूटनीतिक और आर्थिक अलगाव ने ईरान को पाकिस्तान, तुर्की और इराक जैसे पड़ोसी देशों पर निर्भर होने के लिए मजबूर कर दिया है, लेकिन ये रास्ते भी नौसैनिक मार्गों की भरपाई करने में सक्षम नहीं हैं.
ईरान इस समय एक ऐसी चौतरफा घेराबंदी में फंसा है, जहां युद्ध के मैदान से ज्यादा उसकी अर्थव्यवस्था हार रही है.