ईरान युद्ध के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने ओपेक छोड़ा
नई दिल्ली । डेस्क: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने मंगलवार को पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक (OPEC) और ओपेक+ से अलग होने की घोषणा कर दी है. यूएई का यह कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वर्तमान में ईरान युद्ध के कारण दुनिया पहले से ही ऐतिहासिक ऊर्जा संकट का सामना कर रही है.
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ईरान और ओमान के बीच स्थित महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में ईरानी खतरों और जहाजों पर हमलों के कारण खाड़ी देशों को तेल निर्यात करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओपेक पर तेल की कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाकर दुनिया का शोषण करने का आरोप लगाया है. ट्रंप ने स्पष्ट कहा कि अमेरिका खाड़ी देशों को सैन्य सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन इसके बदले ओपेक सदस्य ऊंची कीमतें वसूल कर रहे हैं.
यूएई ने इस अलगाव के पीछे अपने सहयोगी अरब देशों की निष्क्रियता को मुख्य कारण बताया है.
यूएई के राष्ट्रपति के राजनयिक सलाहकार अनवर गर्गाश ने सोमवार को 'गल्फ इन्फ्लुएंसर्स फोरम' में खाड़ी देशों की आलोचना करते हुए कहा कि ईरानी हमलों के दौरान खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) का राजनीतिक और सैन्य रुख ऐतिहासिक रूप से सबसे कमजोर रहा है. गर्गाश ने दुख जताया कि संकट की घड़ी में परिषद से जिस समर्थन की उम्मीद थी, वह नहीं मिलाओपेक (OPEC) और ओपेक+ (OPEC+) क्या है?
ओपेक (OPEC) यानी 'ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज' एक स्थायी अंतर-सरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना सितंबर 1960 में बगदाद सम्मेलन के दौरान ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला द्वारा की गई थी. इसका मुख्य उद्देश्य अपने सदस्य देशों की पेट्रोलियम नीतियों का समन्वय और एकीकरण करना है ताकि उपभोक्ताओं को तेल की कुशल, आर्थिक और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित हो सके और उत्पादकों को उनकी पूंजी पर उचित रिटर्न मिले. वर्तमान में ओपेक के 12 मुख्य सदस्य देशों में अल्जीरिया, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और वेनेजुएला शामिल हैं (नोट: कतर, अंगोला और इक्वाडोर जैसे देश अलग-अलग समय पर इसकी सदस्यता छोड़ चुके हैं).
ओपेक+ (OPEC+) ओपेक का एक विस्तारित गठबंधन है, जिसमें ओपेक के मूल सदस्यों के साथ-साथ 10 अन्य गैर-ओपेक तेल उत्पादक देश शामिल हैं जो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ओपेक के साथ मिलकर काम करते हैं. ओपेक+ के इन बाहरी सहयोगियों में रूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, मैक्सिको, मलेशिया, बहरीन, ब्रुनेई, ओमान, सूडान और दक्षिण सूडान शामिल हैं.
ओपेक और ओपेक+ का सबसे महत्वपूर्ण काम वैश्विक तेल उत्पादन की मात्रा निर्धारित करना है; जब बाजार में तेल की आपूर्ति अधिक हो जाती है और कीमतें गिरने लगती हैं, तो ये संगठन उत्पादन में कटौती का निर्णय लेते हैं ताकि कीमतों को स्थिर रखा जा सके, और मांग बढ़ने पर ये उत्पादन बढ़ाकर बाजार को संतुलित करते हैं. सरल शब्दों में, यह संगठन वैश्विक तेल अर्थव्यवस्था के 'रेगुलेटर' के रूप में कार्य करता है, जिसका दुनिया भर की ईंधन कीमतों और शेयर बाजारों पर सीधा प्रभाव पड़ता है.