बेलगाम ट्रंप को जनमत नहीं, बाजार की चिंता है
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध केवल एक सैन्य टकराव नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सत्ता का प्रदर्शन है जो न तो अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानती है और न ही लोकतांत्रिक संस्थाओं के अंकुश को. जनवरी 2025 में अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही ट्रंप ने जिस तरह से वेनेजुएला और अब ईरान पर बिना किसी ठोस उकसावे के हमले किए हैं, उसने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अमेरिकी संविधान और वैश्विक व्यवस्था के 'चेक एंड बैलेंस' पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं.
आज के हालात में विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि ट्रंप को न तो वैश्विक जनमत की परवाह है और न ही उन्हें अपने देश की कांग्रेस या अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों का डर है. उनकी एकमात्र चिंता और उनकी नीतियों का एकमात्र वास्तविक नियंत्रक 'बाजार' की चाल है. प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर किम लेन शेपेले जैसी विश्लेषकों का तर्क है कि ट्रंप सार्वजनिक राय या विरोध प्रदर्शनों के बजाय मार्केट परफॉरमेंस को अधिक महत्व देते हैं, और यही वह बिंदु है जहाँ उनका 'अजेय' दिखने वाला रथ डगमगाता नजर आ रहा है.
ट्रंप का यह दूसरा कार्यकाल उनकी "स्वयं की नैतिकता" के विजन पर आधारित है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) जैसे प्रतिबंधों को उन्होंने पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के प्रोफेसर माइकल बेकर के अनुसार, ट्रंप की कार्यशैली में "गैंगस्टरिज्म" की झलक मिलती है, जहाँ वे अंतरराष्ट्रीय नियमों को केवल तभी स्वीकार करते हैं जब वे उनके अल्पकालिक राजनीतिक हितों को साधते हों.
अन्य वैश्विक शक्तियां और मध्य शक्तियां जैसे कि ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा, जो अक्सर मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं की दुहाई देते हैं, वे भी ट्रंप के आगे नतमस्तक नजर आ रहे हैं. उनकी चुप्पी ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिका की सैन्य और वित्तीय प्रधानता के आगे वैश्विक नैतिकता का कोई मोल नहीं रह गया है. संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं, जिनका काम संवाद के जरिए संघर्ष को रोकना था, अब ट्रंप के लिए केवल एक 'उपकरण' बनकर रह गई हैं, जिनका उपयोग वे अपनी सुविधानुसार प्रवासन जैसे मुद्दों को हल करने के लिए करते हैं.
इस पूरे परिदृश्य में सबसे चौंकाने वाली बात अमेरिका के भीतर मौजूद संवैधानिक संस्थाओं की विफलता है. कांग्रेस, जो युद्ध की घोषणा करने की शक्ति रखती है, और न्याय विभाग, जो कानूनी सीमाओं को परिभाषित करता है, दोनों ही ट्रंप की महत्वाकांक्षाओं के सामने ढाल बनने के बजाय उनके सहयोगी नजर आ रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट, जिसे ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान अपनी पसंद के न्यायाधीशों से भर दिया था, अब उनके लगभग हर फैसले को मौन सहमति देता दिखता है. निचली अदालतें अप्रवासन और आपातकालीन शक्तियों पर कुछ हद तक नियंत्रण लगाने की कोशिश तो करती हैं, लेकिन विदेश नीति के संवेदनशील मामलों में उनकी पहुंच सीमित है. ऐसी स्थिति में, जब सत्ता के सभी पारंपरिक स्तंभ गिर चुके हों, तब ट्रंप का ध्यान केवल इस बात पर रहता है कि तेल की कीमतें और शेयर बाजार उनके निर्णयों पर क्या प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
यही कारण है कि आज कई पर्यवेक्षक कह रहे हैं कि ईरान के खिलाफ ट्रंप का युद्ध अपने ही जाल में फंसता जा रहा है. ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि यह युद्ध जल्द ही खत्म हो जाएगा, लेकिन हकीकत इसके उलट है. ईरान ने न केवल पलटवार किया है, बल्कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के माध्यम से वैश्विक तेल आपूर्ति के गले पर हाथ रख दिया है.
दुनिया के 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी का मार्ग अवरुद्ध होने से ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) द्वारा 400 मिलियन बैरल तेल बाजार में छोड़ने के बावजूद कीमतें कम नहीं हो रही हैं और ईरान की यह चेतावनी कि तेल 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है, ट्रंप के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.
ट्रंप जानते हैं कि जब तक युद्ध बाजारों को अस्थिर नहीं करता, तब तक वे सुरक्षित हैं, लेकिन जैसे ही ऊर्जा की बढ़ती लागत अमेरिकी घरों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने लगी है, उनकी "neo-imperialist" नीतियों पर बाजार का दबाव बढ़ने लगा है.
अंततः, ट्रंप के 'बेलगाम' होने की कहानी आर्थिक परिणामों के धरातल पर आकर ठहर जाती है. उनके समर्थक भले ही कुछ समय के लिए गैस की बढ़ी हुई कीमतों को सहने के लिए तैयार हों, लेकिन वैश्विक बाजार की अस्थिरता और तेल संकट से उत्पन्न महंगाई अंततः उस आधार को हिला देगी जिस पर ट्रंप अपनी शक्ति का महल खड़ा करना चाहते हैं.
जानकारों का मानना है कि ट्रंप को रोकने वाली कोई संस्था या देश नहीं, बल्कि वह आर्थिक गिरावट होगी जो उनके युद्धप्रिय फैसलों का अनिवार्य परिणाम है. बाजार की ताकतें, जो किसी भी राष्ट्रपति या सेनापति के नियंत्रण से बाहर होती हैं, आज ट्रंप की सबसे बड़ी बाधा साबित हो रही हैं. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बाजार की यह 'ग्रेविटी' उस राष्ट्रपति को जमीन पर ला पाएगी जो खुद को सभी कानूनों और सीमाओं से ऊपर मानता है.