अमेरिकी चुनाव में ट्रंप का भारतीय नुस्खा- जीतने पर 5000 डालर
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी राजनीति में अमूमन नीतियों, अर्थव्यवस्था, रोजगार और विदेश नीति पर बहसों का जोर रहता है. लेकिन आगामी चुनावों से ठीक पहले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा दांव खेला है, जिसे भारतीय राजनीति का ‘रेवड़ी कल्चर’ या 'कैश ट्रांसफर स्कीम' मॉडल कहा जा सकता है. ट्रंप ने वादा किया है कि यदि उनकी पार्टी चुनाव जीतती है, तो वे देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को 5,000 डॉलर (लगभग 4.15 लाख रुपये) का नकद 'ट्रंप डिविडेंड' देंगे.
डलास में 'रिपब्लिकन नेशनल मिडटर्म कन्वेंशन' को संबोधित करते हुए ट्रंप ने वादा किया कि अगर उनकी रिपब्लिकन पार्टी संसद के दोनों सदनों (हाऊस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट) पर नियंत्रण हासिल कर लेती है, तो वे अमेरिका के प्रत्येक वयस्क नागरिक को 5,000 डॉलर का नकद 'ट्रंप डिविडेंड' देंगे.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी चुनाव के इस नाटकीय मोड़ ने साबित कर दिया है कि सत्ता पाने के लिए सीधे बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर (डीबीटी) करने की कला अब केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी अपनाई जा रही है.
भारत से सीखा ‘कैश फॉर वोट’ का गुर?
भारत में चुनाव जीतने के लिए सीधे नकद सहायता या गारंटियों का वादा करना बेहद आम है. लगभग हर प्रमुख राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में महिलाओं, युवाओं या किसानों के खातों में निश्चित राशि भेजने का वादा करता है. ट्रंप का 5000 डॉलर का वादा ठीक उसी तर्ज पर देखा जा रहा है.
भारतीय राज्यों के प्रमुख उदाहरण:
छत्तीसगढ़: राज्य में महिलाओं को वित्तीय सहायता देने के लिए 'महतारी वंदन योजना' चलाई जा रही है, जिसके तहत पात्र महिलाओं को हर महीने ₹1,000 (वार्षिक ₹12,000) दिए जा रहे हैं. इसी प्रकार किसानों के लिए भी धान खरीदी बोनस जैसी सीधी वित्तीय प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की गईं, जिन्होंने चुनावों के नतीजों में निर्णायक भूमिका निभाई.
पश्चिम बंगाल: पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की 'लक्ष्मीर भंडार योजना' इसका सबसे सटीक उदाहरण है. इस योजना के तहत राज्य की महिलाओं को प्रतिमाह ₹1,000 से ₹1,200 की राशि सीधे बैंक खातों में दी जाती है. तृणमूल कांग्रेस की चुनावी सफलता में इस नकद योजना का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है.
अन्य राज्य: मध्य प्रदेश में 'लाडली बहना योजना', कर्नाटक में 'गृह लक्ष्मी' और तमिलनाडु में 'मगलिर उरिमाई' योजनाएं भी इसी मॉडल के तहत संचालित हैं, जहाँ सरकारें सीधे जनता के हाथ में नकद राशि सौंपती हैं.
मुफ्त की योजनाओं' पर सवाल और बहस
डोनाल्ड ट्रंप के इस वादे की आलोचना भी शुरू हो गई है. आलोचकों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर 5000 डॉलर बांटने से अमेरिकी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा.
यह बहस ठीक वैसी ही है जैसी भारत में "फ्रीबीज" (मुफ्त की रेवड़ियों) को लेकर चलती है. भारतीय रिजर्व बैंक और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के सीधे कैश ट्रांसफर से तात्कालिक चुनावी फायदा तो मिल सकता है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह देश की अर्थव्यवस्था, वित्तीय घाटे (Fiscal Deficit) और मुद्रास्फीति (Inflation) के लिए घातक साबित होता है.
अब देखना यह होगा कि क्या अमेरिकी मतदाता नकद राशि के इस लुभावने वादे पर भरोसा करते हैं या ट्रंप का यह 'भारतीय नुस्खा' अमेरिकी सियासत में बेअसर रहता है.