ईरान के होरमुज़ दांव के सामने बेबस ट्रंप, इस मु्द्दे पर दोस्त-दोस्त न रहे
नई दिल्ली । डेस्क: ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच छिड़े भीषण युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां महाशक्ति कहा जाने वाला अमेरिका खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है. दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग, होरमुज़ जलडमरूमध्य को लेकर जारी तनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का 'नौसैनिक गठबंधन' का दांव पूरी तरह उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है.
ट्रंप ने दुनिया भर के देशों से आह्वान किया था कि वे इस संकीर्ण समुद्री रास्ते को सुरक्षित करने के लिए अपने युद्धपोत भेजें, ताकि तेल की आपूर्ति बहाल हो सके. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अमेरिका के करीबी सहयोगी भी इस युद्ध की आग में कूदने को तैयार नहीं हैं.
इसके विपरीत, अधिकांश देश ट्रंप के साथ खड़े होने के बजाय तेहरान के साथ पर्दे के पीछे बातचीत कर अपने जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ता निकालने की जुगत में लगे हैं. इस स्थिति ने ट्रंप प्रशासन को कूटनीतिक मोर्चे पर पूरी तरह बेबस कर दिया है, जबकि ईरान ने इस समुद्री धमनी पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है.
होरमुज़ जलडमरूमध्य, जिसकी चौड़ाई महज 39 किलोमीटर है, इस समय वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा 'फ्लैशपॉइंट' बना हुआ है. ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के नेतृत्व में तेहरान ने इसे एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है. ईरान का दावा है कि उसने मार्ग को पूरी तरह बंद नहीं किया है, बल्कि इसे केवल अपने 'दुश्मनों' यानी अमेरिका, इजरायल और उनके सक्रिय सहयोगियों के लिए बाधित किया है.
इस कूटनीतिक चाल ने ट्रंप के उस नैरेटिव को कमजोर कर दिया है जिसमें वे इसे एक 'अंतरराष्ट्रीय संकट' बता रहे थे. जब ईरान ने अन्य देशों को मार्ग देने का विकल्प खुला रखा, तो दुनिया की प्रमुख शक्तियों ने युद्ध में शामिल होने के बजाय ईरान से सीधे संवाद करना अधिक सुरक्षित समझा. यही कारण है कि चीन, फ्रांस, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े तेल आयातक देशों ने ट्रंप के आह्वान पर अपने युद्धपोत भेजने से स्पष्ट या परोक्ष रूप से इनकार कर दिया है.
ट्रंप का दावा था कि ईरान की सैन्य क्षमता '100 प्रतिशत' नष्ट हो चुकी है, लेकिन होरमुज़ में लगातार होते हमलों ने इस दावे की हवा निकाल दी है. पिछले दो हफ्तों में एक दर्जन से अधिक जहाजों पर हुए हमलों ने साबित कर दिया है कि ईरान की 'छापामार समुद्री युद्धनीति' का मुकाबला करना किसी भी आधुनिक नौसेना के लिए बेहद महंगा और जोखिम भरा सौदा है.
ट्रंप की इस धमकी के बावजूद कि अमेरिका ईरानी तटरेखा पर 'बमबारी' जारी रखेगा, सहयोगी देशों को डर है कि युद्ध में शामिल होने से उनकी ऊर्जा लागत और बढ़ जाएगी और उनके जहाज सीधे तौर पर ईरानी मिसाइलों और ड्रोन के निशाने पर आ जाएंगे. फ्रांस जैसे देशों ने साफ कर दिया है कि उनका रुख रक्षात्मक है और वे ईरान के खिलाफ किसी भी युद्ध का हिस्सा नहीं बनेंगे. वहीं जापान, जो अपनी ऊर्जा के लिए खाड़ी पर निर्भर है, ने इसे 'अत्यंत कठिन कानूनी और सैन्य स्थिति' करार देते हुए दूरी बना ली है.
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प मोड़ उन देशों का रुख है जो पारंपरिक रूप से अमेरिका के मित्र माने जाते हैं. भारत, तुर्की, इटली और यहां तक कि फ्रांस जैसे देशों के बारे में खबरें हैं कि वे सीधे ईरानी अधिकारियों के संपर्क में हैं. भारत ने अपने एलपीजी जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए तेहरान के साथ बातचीत की है, और ईरान ने 'विशेष अपवाद' के तहत उन्हें रास्ता भी दिया है.
तुर्की के जहाज भी तेहरान से मंजूरी मिलने का इंतजार कर रहे हैं. यह स्थिति दर्शाती है कि दुनिया अब अमेरिका के 'युद्ध के एजेंडे' पर चलने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रही है. ट्रंप ने उम्मीद की थी कि तेल की बढ़ती कीमतें (जो 100 डॉलर प्रति बैरल पार कर चुकी हैं) दुनिया को ईरान के खिलाफ एकजुट कर देंगी, लेकिन हुआ इसके उलट दुनिया ने ईरान से समझौता करना ज्यादा व्यावहारिक समझा ताकि कीमतें 200 डॉलर तक न पहुंचें.
ट्रंप की घरेलू स्थिति भी इस मोर्चे पर कमजोर होती जा रही है. अमेरिकी सीनेटरों ने खुले तौर पर आलोचना की है कि सरकार के पास युद्ध शुरू करने की योजना तो थी, लेकिन उसे खत्म करने या होरमुज़ को सुरक्षित रूप से फिर से खोलने का कोई ठोस खाका नहीं है.
जानकार मानते हैं कि ट्रंप का 'प्रेशर टैक्टिक्स' इस बार विफल हो गया है क्योंकि होरमुज़ की भूगोल ईरान के पक्ष में है. संकीर्ण मार्ग, ऊंची चट्टानें और ईरान की सटीक मिसाइल क्षमता ने इसे एक ऐसे 'डेथ ट्रैप' में बदल दिया है जहां कोई भी देश अपना अरबों डॉलर का युद्धपोत और अपने सैनिकों की जान जोखिम में नहीं डालना चाहता. ट्रंप ने सभी तेल आयातक देशों को समर्थन देने का वादा किया था, लेकिन जब कोई देश जहाज भेजने को ही तैयार नहीं है, तो अमेरिकी समर्थन का आश्वासन महज एक बयान बनकर रह गया है.
अंततः, होरमुज़ का यह संकट डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. जहां एक ओर वे इसे 'आर्टिफिशियल बाधा' बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दुनिया इसे एक वास्तविक सैन्य खतरे के रूप में देख रही है जिसे केवल बातचीत से सुलझाया जा सकता है, युद्धपोतों से नहीं.
ईरान ने अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाते हुए ट्रंप को कूटनीतिक रूप से एक कोने में धकेल दिया है. अब अमेरिका के पास केवल दो ही रास्ते बचे हैं या तो वह अकेले ही इस युद्ध को और भयानक स्तर पर ले जाए, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था तबाह होने का खतरा है, या फिर वह अपनी शर्तों को नरम करते हुए किसी मध्यस्थ के जरिए ईरान के साथ मेज पर आए. फिलहाल, होरमुज़ के पानी में ट्रंप की ताकत नहीं, बल्कि ईरान की 'साइलेंट डिप्लोमेसी' और क्षेत्रीय पकड़ हावी नजर आ रही है.