ट्रंप की ईरान में सत्ता परिवर्तन की जिद्द तेल के दाम बढ़ा रही है
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) की आक्रामक और अड़ियल नीति ने आज पूरी दुनिया को एक भयानक ऊर्जा संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है. ट्रंप प्रशासन द्वारा इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर थोपे गए इस युद्ध ने न केवल मध्य पूर्व की शांति को भंग किया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर भी तोड़नी शुरू कर दी है.
आज पेट्रोल पंपों पर बढ़ती कीमतें और रोजमर्रा की वस्तुओं की महंगाई इस बात का प्रमाण हैं कि एक व्यक्ति की राजनीतिक जिद्द पूरी मानवता के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है. ट्रंप की इस 'मैक्सिमम प्रेशर' रणनीति और सीधे सैन्य टकराव ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग को युद्ध के मैदान में बदल दिया है, जिससे दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का पांचवां हिस्सा अधर में लटक गया है.
ईरान ने अपनी सुरक्षा के लिए इस मार्ग को प्रभावी रूप से बंद करने की जो चेतावनी दी है और कतर व सऊदी अरब की ऊर्जा सुविधाओं पर जो हमले हुए हैं, वे सीधे तौर पर ट्रंप की उकसावे वाली कार्रवाई का नतीजा हैं. ट्रंप ने न केवल ओबामा काल के परमाणु समझौते को तोड़ा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों को दरकिनार कर जिस तरह से एक संप्रभु राष्ट्र की सत्ता पलटने का खेल शुरू किया है, उसने वैश्विक आर्थिक स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है. अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ और उनके द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से बनी वैश्विक व्यवस्था को तहस-नहस करने के प्रयासों ने पहले ही बाजार को डरा रखा था, और अब यह नया संघर्ष आग में घी का काम कर रहा है.
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में बाजार जिस अनिश्चितता से गुजर रहा है, उसका अंत किसी को नहीं पता, क्योंकि ट्रंप का अगला कदम क्या होगा, यह कोई नहीं कह सकता. इस समय ब्रेंट क्रूड की कीमतें 84 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं, जो पहले ही 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कर चुकी हैं, लेकिन यह तो केवल शुरुआत है. यदि ट्रंप की सत्ता परिवर्तन की यह जिद्द अगले कुछ हफ्तों तक जारी रहती है, तो तेल की कीमतें 100 डॉलर से लेकर 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं.
कतर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी की यह चेतावनी कि उत्पादन कुछ ही दिनों में पूरी तरह ठप हो सकता है, सीधे तौर पर ट्रंप की नीतियों की विफलता को दर्शाती है. दुनिया के सात प्रमुख तेल उत्पादक देशों के पास भंडारण क्षमता एक महीने से भी कम समय की बची है, और यदि होर्मुज का मार्ग बंद रहा, तो वैश्विक बाजार में प्रतिदिन 20 मिलियन बैरल तेल की कमी हो जाएगी.
ट्रंप यह दावा जरूर करते हैं कि अमेरिका आज दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है, लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि वैश्विक बाजार आपस में जुड़े हुए हैं. अमेरिका अकेले इतनी बड़ी आपूर्ति की कमी को पूरा नहीं कर सकता. उनकी इस जिद्द का सबसे भयावह असर एशिया और यूरोप पर पड़ रहा है. भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं, ट्रंप की इस 'पॉलिसी ऑफ केओस' (अराजकता की नीति) के सबसे बड़े शिकार बन रहे हैं.
तेल ही नहीं, बल्कि तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के बाजार में भी ट्रंप ने तबाही मचा दी है. कतर एनर्जी द्वारा उत्पादन रोकने के फैसले के बाद यूरोप में गैस की कीमतों में 50 प्रतिशत का उछाल आया है. चूंकि यूरोप अभी अपनी सर्दियों के अंत में है और वहां स्टॉक कम है, इसलिए ट्रंप की यह जंग आम यूरोपीय नागरिकों को ठंड और महंगाई में ठिठुरने पर मजबूर कर रही है.
जेपी मॉर्गन और गोल्डमैन सैक्स जैसे वैश्विक वित्तीय संस्थानों की चेतावनियां स्पष्ट कर रही हैं कि यदि यह गतिरोध जारी रहा, तो दुनिया एक ऐसी मंदी की चपेट में आ जाएगी जिससे उबरने में दशकों लग सकते हैं. ट्रंप की इस जिद के कारण बीमा कंपनियों ने खाड़ी क्षेत्र में जहाजों का बीमा करना बंद कर दिया है, जिससे समुद्री व्यापार 90 प्रतिशत तक गिर गया है. हालांकि ट्रंप अब अमेरिकी खजाने से इन जहाजों का बीमा करने और नौसेना के जरिए एस्कॉर्ट देने की बात कर रहे हैं, लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं बल्कि उसे और भड़काना है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, तेल की कीमतों में हर 10 प्रतिशत की बढ़त वैश्विक विकास दर को सीधे तौर पर प्रभावित करती है. यह विडंबना ही है कि एक तरफ ट्रंप अमेरिका को 'महान' बनाने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी ईरान में सत्ता परिवर्तन की भूख ने पूरी दुनिया को महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक अस्थिरता के गर्त में धकेल दिया है.
आज पूरी दुनिया यह महसूस कर रही है कि ट्रंप की ईरान नीति केवल एक देश को निशाना नहीं बना रही, बल्कि हर उस देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार कर रही है जो शांति और स्थिरता चाहता है. यदि समय रहते अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ट्रंप की इस विनाशकारी जिद्द पर लगाम नहीं लगाई, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था का यह पतन अपरिहार्य है.