TMC: नाम और सिंबल पर दोनों गुटों ने ठोका दावा
कोलकाता । डेस्क: अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही अंदरूनी कलह अब एक ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है. पार्टी के भीतर उभरे बागी गुट ने अब आधिकारिक तौर पर मूल पार्टी पर अपना दावा ठोक दिया है. गुरुवार को यह विवाद देश की शीर्ष चुनावी संस्था निर्वाचन सदन के दरवाजे तक जा पहुंचा, जिसने तृणमूल कांग्रेस में एक बड़े और औपचारिक विभाजन की जमीन तैयार कर दी है.
विधानसभा में बागी गुट का नेतृत्व कर रहे विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने अपने समर्थक विधायकों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के अन्य सदस्यों से मुलाकात की. इस मुलाकात में बागी गुट ने न केवल तृणमूल कांग्रेस के नाम और आधिकारिक 'ट्विन-फ्लोवर' (जोड़ा-फूल) चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश किया, बल्कि पार्टी के फंड पर भी अपना अधिकार जताया है.
'चार्टर्ड माफिया' बनाम 'आम लोग' की लड़ाई
इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात के बाद मीडिया से बात करते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने पार्टी के भीतर उभरे नए नेतृत्व पर तीखे हमले किए. उन्होंने किसी का नाम लिए बिना सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व मॉडल को निशाने पर लिया. ऋतब्रत ने अरबी और संस्कृत के भाषाई संदर्भों का इस्तेमाल करते हुए एक दिलचस्प तंज कसा. उन्होंने कहा कि वे लोग 'आम लोग' (सामान्य जनता) हैं, न कि 'चार्टर्ड लोग'. उनका इशारा तृणमूल कांग्रेस में बढ़ रहे वीआईपी कल्चर और चार्टर्ड विमानों के अत्यधिक इस्तेमाल की ओर था.
बागी नेता ने आरोप लगाया कि पार्टी के हर चार रुपये के खर्च में से एक रुपया चार्टर्ड उड़ानों पर उड़ाया जा रहा है. उन्होंने मौजूदा संगठनात्मक ढांचे की तुलना 1930 के दशक के जर्मनी के हालातों से करते हुए कहा कि पार्टी के भीतर एक 'चार्टर्ड माफिया' और कुछ नौकरशाहों ने कब्जा कर लिया था, जिसके कारण जमीनी स्तर की यह पार्टी ताश के पत्तों की तरह ढह गई.
ऋतब्रत ने स्पष्ट किया कि 22 जून को न्यू टाउन के एक होटल में बुलाए गए विशेष सत्र में पार्टी की सर्वोच्च नेता ममता बनर्जी और उनके भतीजे को राष्ट्रीय कार्यकारी समिति से हटाकर अरूप रॉय को नया अध्यक्ष चुन लिया गया था.
चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से मांगा जवाब, 'सादिर अली' टेस्ट पर टिकी नजरें
बागी गुट के इन दावों के बाद चुनाव आयोग ने भी अपनी प्रशासनिक मुस्तैदी तेज कर दी है. आयोग के सूत्रों के अनुसार, शुरुआती प्रक्रिया के तहत पंजीकृत पार्टी को इन बदलावों की जानकारी दी जाएगी. यदि मूल नेतृत्व इन दावों का विरोध करता है, तो आयोग आधिकारिक तौर पर 'विवाद की घोषणा' (डिक्लेरेशन ऑफ डिस्प्यूट) जारी कर कानूनी कार्यवाही शुरू करेगा.
फिलहाल, चुनाव आयोग के प्रवक्ता ने पुष्टि की है कि ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी दोनों को पत्र जारी कर संगठनात्मक चुनाव और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के दावों पर जवाब मांगा गया है. दोनों पक्षों को सोमवार, 6 जुलाई की शाम 5:30 बजे तक अपनी प्रतिक्रिया देने का समय दिया गया है.
आयोग इस मामले को सुलझाने के लिए सिंबल ऑर्डर, 1968 के पैरा 15 और सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध 'सादिक अली बनाम चुनाव आयोग (1972)' मामले के सिद्धांतों का पालन करेगा, जिसमें पार्टी के उद्देश्य, संविधान और बहुमत के परीक्षण (टेस्ट ऑफ मेजॉरिटी) को आधार बनाया जाता है. इससे पहले शिवसेना और एनसीपी के मामलों में भी इसी तरह के कानूनी दावों के आधार पर फैसले आ चुके हैं.
'तीन सदन, तीन मॉडल': क्या है बागी गुट की अनूठी रणनीति?
तृणमूल कांग्रेस का यह विभाजन भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे अनोखे मामलों में से एक बनता जा रहा है. बागी गुट का दावा है कि उनके पास पश्चिम बंगाल विधानसभा के 80 में से कम से कम 64 विधायकों का समर्थन हासिल है, जो दलबदल कानून से बचने के लिए दो-तिहाई के आंकड़े से अधिक है.
हालांकि, लोकसभा और राज्यसभा में रणनीति पूरी तरह अलग दिखाई दे रही है. तृणमूल के 20 लोकसभा सदस्यों ने एक अलग रास्ता चुनते हुए 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' का दामन थाम लिया है, जो केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन को रचनात्मक समर्थन देने की बात कह रहा है.
वहीं, राज्यसभा के 13 में से चार सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है और आने वाले दिनों में कुछ और इस्तीफे संभावित हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह न तो शिवसेना का 'शिंदे मॉडल' है और न ही कोई दूसरा पुराना फॉर्मूला, बल्कि यह विधानसभा में ऋतब्रत मॉडल, लोकसभा में काकोली मॉडल और राज्यसभा में सुखेंदु मॉडल का एक बेहद अनूठा और त्रिस्तरीय गठजोड़ है.
ममता खेमे का पलटवार: 'किरायेदार खुद को मकान मालिक बता रहा है'
इस बीच, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले कालीघाट खेमे ने बागी गुट की इस पूरी कवायद को अवैध और साजिश करार दिया है. दिल्ली और कोलकाता में एक साथ आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता के वफादार सांसदों सागरिका घोष और सौगत राय ने चुनाव आयोग के मुख्यालय में बागी प्रतिनिधिमंडल की बैठक पर गंभीर सवाल उठाए. सौगत राय ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की निष्पक्षता पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि यह पूरी बैठक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर की गई है.
वहीं, कोलकाता में पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधायक कुणाल घोष ने बागियों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जो लोग आज खुद को 'असली' तृणमूल बता रहे हैं, उन्होंने महज दो महीने पहले चुनाव लड़ने के लिए जो हलफनामा दिया था, उस पर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के ही हस्ताक्षर थे.
कुणाल घोष ने तंज कसते हुए कहा, "आज स्थिति यह हो गई है कि घर का किरायेदार खुद को मकान मालिक घोषित करने पर उतारू है." हालांकि, इस तीखे वार के बावजूद बागी खेमा पीछे हटने को तैयार नहीं है और नाम तथा सिंबल की इस लड़ाई को अंत तक ले जाने का मन बना चुका है.