चाय से कम हो सकता है डिमेंशिया का खतरा
वॉशिंगटन । डेस्क: बढ़ती उम्र के साथ याददाश्त खोने और डिमेंशिया जैसी बीमारियों के डर के बीच एक राहत भरी खबर सामने आई है. हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक व्यापक अध्ययन में यह पाया गया है कि रोजाना दो से तीन कप कॉफी या एक से दो कप चाय का सेवन मस्तिष्क की कार्यक्षमता को बनाए रखने और डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) के जोखिम को कम करने में मददगार साबित हो सकता है. यह अध्ययन प्रतिष्ठित 'जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन' (JAMA) में प्रकाशित हुआ है.
शोधकर्ताओं ने अमेरिका में लगभग 43 वर्षों तक चले एक विस्तृत अध्ययन के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जिसमें 1,31,821 स्वास्थ्य पेशेवरों को शामिल किया गया था. अध्ययन के नतीजों से पता चला कि सबसे अधिक कैफीन का सेवन करने वाले पुरुषों और महिलाओं में डिमेंशिया का खतरा औसतन 18 प्रतिशत तक कम था.
दिलचस्प बात यह है कि यह सुरक्षात्मक प्रभाव केवल कैफीनयुक्त कॉफी और चाय में ही देखा गया, जबकि डिकैफिनेटेड (कैफीन रहित) कॉफी पीने वालों में ऐसा कोई लाभ नहीं मिला. इससे यह संकेत मिलता है कि मस्तिष्क को सुरक्षा देने वाला मुख्य तत्व 'कैफीन' ही है.
अध्ययन के नेतृत्वकर्ता सहायक प्रोफेसर डोंग वांग ने बताया कि हालांकि ये परिणाम उत्साहजनक हैं, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि इसका सुरक्षात्मक प्रभाव सीमित है और उम्र बढ़ने के साथ मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के अन्य तरीके भी अपनाने चाहिए.
शोध में यह भी साफ हुआ कि डिमेंशिया का खतरा उन लोगों में सबसे कम था जिन्होंने 'मध्यम' मात्रा में कैफीन का सेवन किया. वहीं, जिन लोगों में डिमेंशिया का अनुवांशिक खतरा अधिक था, उन्हें भी कॉफी के सेवन से समान रूप से लाभ मिला.
वैज्ञानिकों के अनुसार, कैफीन मस्तिष्क में हानिकारक प्रोटीन के जमाव को कम करता है और सूजन को घटाता है, जो मानसिक गिरावट को रोकने में मदद करते हैं.
इसके अलावा, चाय और कॉफी में पाए जाने वाले पॉलीफेनोल्स और क्लोरोजेनिक एसिड जैसे तत्व मस्तिष्क में रक्त प्रवाह को बेहतर बनाते हैं और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम कर तंत्रिका कोशिकाओं को मजबूती प्रदान करते हैं. यह शोध 24 साल पहले शुरू हुई उस बहस को पुख्ता करता है जिसमें पहली बार कैफीन और अल्जाइमर के बीच सुरक्षात्मक संबंध की बात कही गई थी.
गौरतलब है कि डिमेंशिया (Dementia) कोई एक विशिष्ट बीमारी नहीं है, बल्कि यह उन लक्षणों के समूह के लिए उपयोग किया जाने वाला शब्द है जो याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और सामाजिक व्यवहार को इतना प्रभावित करते हैं कि व्यक्ति के सामान्य दैनिक कामकाज में बाधा आने लगती है. यह मुख्य रूप से मस्तिष्क की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने के कारण होता है, जिससे मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों के बीच संचार बाधित हो जाता है.
अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे सामान्य प्रकार है, जो कुल मामलों में से लगभग 60-80 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार होता है. इसके शुरुआती लक्षणों में अक्सर छोटी-छोटी बातें भूलना, परिचित रास्तों पर भ्रमित होना, बातचीत में सही शब्द न ढूंढ पाना या व्यक्तित्व में बदलाव आना शामिल है.
जैसे-जैसे यह स्थिति आगे बढ़ती है, व्यक्ति के लिए निर्णय लेना, समय और स्थान का बोध रखना और यहाँ तक कि अपनी बुनियादी देखभाल करना भी मुश्किल हो जाता है. हालांकि उम्र बढ़ना डिमेंशिया का सबसे बड़ा जोखिम कारक है, लेकिन यह सामान्य बुढ़ापे का अनिवार्य हिस्सा नहीं है. इसके होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें अनुवांशिक प्रभाव, सिर की चोट, रक्त वाहिकाओं की समस्याएं (वैस्कुलर डिमेंशिया) और मस्तिष्क में हानिकारक प्रोटीन का जमाव शामिल हैं.
वर्तमान में डिमेंशिया का पूरी तरह से कोई इलाज नहीं है, लेकिन सही समय पर पहचान, दवाओं और जीवनशैली में बदलाव जैसे कि स्वस्थ आहार और कैफीन के उचित सेवन के माध्यम से इसके लक्षणों को प्रबंधित किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है.