सुप्रीम कोर्ट: परमाणु कानून के खिलाफ याचिका पर सरकार से जवाब तलब
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने देश के नए परमाणु कानून, 'सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' (SHANTI) अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सतर्क रुख अपनाया है. कोर्ट ने कहा कि यह एक संवेदनशील विधायी नीति का मामला है और सरकार के पास विकास तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को गति देने वाली नीतियां बनाने का पूरा अधिकार है.
इस कानून के तहत परमाणु दुर्घटना की स्थिति में वित्तीय देनदारी की सीमा को 4,000 करोड़ रुपये से कम पर तय किया गया है, जिसका याचिकाकर्ता कड़ा विरोध कर रहे हैं.
यह याचिका पूर्व आईएएस अधिकारी ई.ए.एस. सरमा द्वारा दायर की गई है, जिनकी ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और नेहा राठी अदालत में पेश हुए. याचिकाकर्ता ने मुख्य रूप से इस बात पर आपत्ति जताई है कि यह नया कानून निजी क्षेत्र और विदेशी कंपनियों को भारत में परमाणु ऊर्जा संयंत्र संचालित करने की अनुमति देता है.
इसके साथ ही, दुर्घटना की स्थिति में ऑपरेटरों की जवाबदेही को बेहद निचले स्तर पर सीमित कर दिया गया है और उपकरण आपूर्ति करने वाली कंपनियों को किसी भी तरह की देनदारी से पूरी तरह मुक्त रखा गया है.
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि क्या वे दुनिया के किसी ऐसे देश का नाम बता सकते हैं जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए परमाणु संयंत्रों पर निर्भर नहीं है? इस पर वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि जापान और जर्मनी जैसे देशों ने अपने परमाणु संयंत्रों को बंद कर दिया है.
उन्होंने जोर देकर कहा कि सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की तुलना में परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने की लागत 40 गुना अधिक है. यदि भारत अपनी बंजर भूमि का महज 6 प्रतिशत हिस्सा भी सौर ऊर्जा के लिए सुरक्षित कर दे, तो देश की बिजली जरूरतें आसानी से पूरी हो सकती हैं.
याचिकाकर्ता ने अदालत को सुप्रीम कोर्ट के ही 40 साल पुराने ऐतिहासिक फैसले की याद दिलाई. वर्ष 1986 के प्रसिद्ध ओलियम गैस लीक मामले का हवाला देते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि तत्कालीन पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि कोई खतरनाक उद्योग चलाने वाला उद्यम जितना बड़ा और समृद्ध होगा, दुर्घटना की स्थिति में उसके द्वारा दिया जाने वाला मुआवजा भी उतना ही अधिक होना चाहिए.
उस समय सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 12 के दायरे को बढ़ाते हुए खतरनाक गतिविधियों में शामिल निजी कंपनियों को भी 'राज्य' की परिभाषा में शामिल किया था, ताकि नागरिकों के जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) की रक्षा की जा सके.
प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि परमाणु संयंत्र निश्चित रूप से एक अत्यंत खतरनाक और जोखिम भरी गतिविधि है, इसलिए इसमें शामिल कंपनियों की जिम्मेदारी पूर्ण और गैर-हस्तांतरणीय होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि केवल विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए मुआवजे की सीमा को कम करके नागरिकों के जीवन के अधिकार की बलि नहीं दी जा सकती.
दूसरी ओर, पीठ में शामिल न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने यह स्पष्ट करना चाहा कि क्या यह याचिका विदेशी कंपनियों के प्रवेश के खिलाफ है या फिर इसका विरोध केवल दुर्घटना के बाद मिलने वाले मुआवजे की कम राशि को लेकर है.
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता को आश्वासन दिया कि याचिका में शांति एक्ट को लेकर उठाई गई सभी आशंकाओं की समीक्षा की जाएगी. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई के दूसरे सप्ताह में तय की है.