सुप्रीम कोर्ट का सरकार से सवालः वक़्फ़ मामला
छत्तीसगढ़ सुप्रीम कोर्ट ने वक़्फ़ संशोधन कानून पर सुनवाई की, सरकार से सवाल
दिल्ली | डेस्कः क्या वो हिंदू समुदाय के धार्मिक ट्रस्ट में मुसलमान या ग़ैर हिंदू को जगह देने पर विचार कर रही है ? यह सवाल सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से वक़्फ़ मामले पर सुनवाई करते हुए पूछा है.
वक़्फ़ संशोधन क़ानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की है.
इस मामले में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने कई टिप्पणियां की हैं और इस पर गुरुवार को फिर सुनवाई होगी.
पीठ ने कहा है कि वो इस क़ानून से जुड़ी कुछ धाराओं को लेकर अंतरिम आदेश जारी करने पर विचार कर रही है.
इस पर केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से निवेदन किया है कि इस मामले में कोई भी आदेश जारी करने से पहले उनको भी सुन लिया जाए.
याचिकाकर्ता व बचाव पक्ष का तर्क
वक़्फ़ संशोधन क़ानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पहले दिन यानी बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई.
इस सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से कपिल सिब्बल, राजीव धवन और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वरिष्ठ वकील पेश हुए.
वकीलों ने तर्क दिया है कि वक़्फ़ संशोधन क़ानून के कई संशोधन धार्मिक मामलों के प्रबंधन के मौलिक अधिकारों पर असर डालते हैं.
साथ ही उन्होंने सरकारी अफ़सर का ये तय करना कि कोई संपत्ति सरकारी है या नहीं और सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल और स्टेट वक़्फ़ बोर्ड में ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों के शामिल करने वाले प्रावधानों को चुनौती दी.
वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस क़ानून का बचाव किया.
उन्होंने तर्क दिया कि इन सभी चिंताओं को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के साथ संसद में हुई बहस के दौरान भी उठाया गया था, जिस पर केंद्र सरकार ने विचार किया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा
आज मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने कहा है कि वो इस मामले में कुछ अंतरिम आदेश पारित करने पर विचार कर रही है.
हालांकि मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी.
सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार कर रही है कि अदालत ने जो भी संपत्तियां वक़्फ़ घोषित की हैं, उन्हें डिनोटिफाइ नहीं किया जाएगा.
इसके साथ ही उस प्रावधान पर भी रोक लगाने का विचार है जिसमें कहा गया है कि अगर किसी संपत्ति के सरकारी संपत्ति होने पर विवाद है, तो जब तक नामित अधिकारी विवाद का फ़ैसला नहीं कर लेता, तब तक उसे वक़्फ़ संपत्ति नहीं माना जा सकता.
कोर्ट उस प्रावधान पर भी रोक लगाने पर विचार कर रहा है, जिसमें कहा गया है कि वक़्फ़ काउंसिल और वक़्फ़ बोर्ड में दो सदस्य गैर-मुस्लिम (पदेन सदस्य के अलावा) होने चाहिए.
इसके साथ ही मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने इस क़ानून के पारित होने के बाद हुई हिंसा की भी निंदा की है. उन्होंने कहा है कि हिंसा होना 'बेहद चिंताजनक' है.
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि क़ानून के सकारात्मक बिंदुओं को ज़रूर बताया जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि कल दोपहर 2 बजे फिर से इस मामले की सुनवाई होगी.
पक्ष और विपक्ष में दायर हुई याचिकाएं
हाल ही में संसद से पारित हुए वक़्फ़ संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में दस से अधिक याचिकाएं दायर की गई थीं.
याचिकाकर्ताओं ने वक़्फ़ संसोधन क़ानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल खड़े किए हैं.
इनमें एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी, एसोसिएशन फ़ॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स, समस्त केरल जमियतुल उलेमा, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और आरजेडी नेता मनोज झा जैसे याचिकाकर्ता शामिल हैं.
वहीं, छह बीजेपी शासित राज्यों ने इस क़ानून की संवैधानिकता को समर्थन देने के लिए याचिकाएं दायर की हैं. इनमें हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और असम राज्य शामिल हैं.
इन सभी राज्यों ने अलग-अलग याचिकाएं दायर कर इस क़ानून के रद्द होने के बाद इसके पड़ने वाले क़ानूनी असर का हवाला दिया है.
कलेक्टर को अधिकार
नए क़ानून के मुताबिक, कलेक्टर सरकार के कब्ज़े में मौजूद वक़्फ़ के दावे वाली ऐसी ज़मीन के बारे में अपनी रिपोर्ट सरकार को भेज सकता है.
कलेक्टर की रिपोर्ट के बाद अगर उस संपत्ति को सरकारी संपत्ति मान लिया गया तो राजस्व रिकॉर्ड में वह हमेशा के लिए सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज हो जाएगी.
नए क़ानून में वक़्फ़ बोर्ड के सर्वे का अधिकार ख़त्म कर दिया गया है. क़ानून के प्रावधान के अनुसार, अब वक़्फ़ बोर्ड सर्वे करके यह नहीं बता सकेगा कि कोई संपत्ति वक़्फ़ की है या नहीं.
पिछले क़ानून में वक़्फ़ बोर्ड के सर्वे कमिश्नर के पास वक़्फ़ के दावे वाली संपत्तियों के सर्वे का अधिकार था लेकिन नए क़ानून में संशोधन के बाद यह अधिकार लेकर उसे ज़िले के कलेक्टर को दे दिया गया है.
पिछले क़ानून में सेन्ट्रल वक़्फ़ काउंसिल के सभी सदस्यों का मुसलमान होना अनिवार्य था लेकिन नए क़ानून में दो ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों का प्रावधान भी जोड़ दिया गया है.
इसके साथ ही सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल के मुस्लिम सदस्यों में भी दो महिला सदस्यों का होना अनिवार्य कर दिया गया है.