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सुप्रीम कोर्ट: गिरफ्तारी का कारण न बताने पर पुलिस अफसरों पर होगी विभागीय कार्रवाई

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22 सित. 2026, 09:14 AM 5 मिनट में पढ़ें 4

सुप्रीम कोर्ट
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नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित में इसके कारण न बताने वाले पुलिस अधिकारियों के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है. शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी है कि यदि किसी आरोपी को गिरफ्तारी का लिखित कारण न दिए जाने के कारण रिहा किया जाता है, तो पुलिस उसे अपनी मर्जी से दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती. ऐसे मामलों में यदि जांच एजेंसी को आरोपी की फिर से हिरासत चाहिए, तो सबसे पहले मामले की जांच किसी अन्य अधिकारी को सौंपनी होगी. इसके साथ ही, संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले जिम्मेदार पुलिस अफसरों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करनी अनिवार्य होगी.


न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूयान और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन करके की गई गिरफ्तारी पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक है. कोर्ट ने कहा कि एक बार जब संविधान का उल्लंघन हो जाता है, तो आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की शक्ति उसी अधिकारी के विवेक पर नहीं छोड़ी जा सकती जिसने इस नियम को तोड़ा था. इसके लिए न्यायिक अनुमति अनिवार्य है.

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पुन: गिरफ्तारी के लिए कड़े नियम और मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी


शीर्ष अदालत ने कहा कि पहली बार में लिखित कारण न देने के कारण मिली रिहाई आरोपी को मामले में हमेशा के लिए गिरफ्तारी से छूट नहीं देती है. हालांकि, यदि पुलिस को आरोपी की हिरासत फिर से चाहिए, तो उसे पहले आरोपी को लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार सौंपने होंगे और संबंधित मजिस्ट्रेट से पूर्व अनुमति लेनी होगी. पुलिस को हिरासत की अर्जी में स्पष्ट कारण बताना होगा कि पहली बार में गिरफ्तारी के आधार क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए थे और अब आरोपी की हिरासत में पूछताछ क्यों आवश्यक है. मजिस्ट्रेट केवल तभी दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति दे सकते हैं जब वे संतुष्ट हों कि कारण शुरुआत में सद्भावी (बोनाफाइड) कारणों से नहीं दिए जा सके थे, जिन्हें अब पूरा कर लिया गया है.


जांच अधिकारी की सेवा पुस्तिका में दर्ज होगी कार्रवाई


मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में तय प्रक्रियाओं को और कड़ा करते हुए पीठ ने नए सुरक्षात्मक उपाय पेश किए हैं. कोर्ट ने निर्देश दिया कि कस्टडी के लिए दी जाने वाली नई अर्जी पर जांच अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी का अनुमोदन (एंडोर्समेंट) होना अनिवार्य है. ऐसे मामलों में शीर्ष अदालत ने कड़ा संदेश देते हुए कहा:


“प्रशासनिक स्तर पर, वरिष्ठ अधिकारी जब अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के लिए रिहा किए गए आरोपी की कस्टडी की मांग करने वाले आवेदन पर अपने अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किया जाए, तो वह मामले की जांच दूसरे अधिकारी को सौंप देगा, और इस प्रकार की गंभीर लापरवाही के लिए विभागीय जांच का निर्देश भी देगा. यदि जांच में दोषी पुलिस अधिकारी (अधिकारियों) के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकलता है, तो ऐसे अधिकारी (अधिकारियों) की सेवा पुस्तिका में प्रविष्टि के साथ विभागीय कार्रवाई की जाएगी.”


संविधान का उल्लंघन किसी भी अपराध में बर्दाश्त नहीं


मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हर हाल में होनी चाहिए, चाहे आरोपी पर लगे आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों. अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा:


“संविधान या संवैधानिक प्रावधान के उल्लंघन को सहन नहीं किया जा सकता. इससे सख्ती से निपटा जाना चाहिए. यह अपराध की प्रकृति या गंभीरता पर निर्भर नहीं है, बल्कि इसके दायरे में सभी अपराध शामिल हैं. इसकी सीमित व्याख्या नहीं की जा सकती.”


जसकरण जीत सिंह देयोल मामले से जुड़ा है पूरा विवाद


यह पूरा मामला पंजाब में एक नाबालिग बच्ची से यौन उत्पीड़न के आरोप में जसकरण जीत सिंह देयोल के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी से उत्पन्न हुआ था. देयोल को 17 मई को गिरफ्तार कर 24 घंटे से अधिक समय बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था. लिखित आधार न दिए जाने के कारण मजिस्ट्रेट ने गिरफ्तारी को अवैध घोषित कर उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था, लेकिन साथ ही कानून का पालन करते हुए पुलिस को फिर से हिरासत मांगने की छूट दे दी थी.


इसके बाद देयोल ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का रुख किया, जहां उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी. हाई कोर्ट ने माना था कि शुरुआती गिरफ्तारी की अवैधता से उन्हें कानून के अनुसार की जाने वाली बाद की गिरफ्तारी से स्थायी सुरक्षा नहीं मिलती. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी.


हाई कोर्ट का आदेश रद्द, सभी राज्यों के डीजीपी को जारी हुए निर्देश


सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश के साथ-साथ मजिस्ट्रेट की उन टिप्पणियों को भी रद्द कर दिया, जिनमें जांच एजेंसी को देयोल के खिलाफ आगे बढ़ने की अनुमति दी गई थी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस अभी भी देयोल से हिरासत में पूछताछ जरूरी मानती है, तो उसे मिहिर राजेश शाह मामले और इस फैसले में तय कड़े नियमों का पालन करना होगा.


इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि इस फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों (DGP), सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल और राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को भविष्य में कड़ाई से पालन हेतु भेजी जाए.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP