SC का कड़ा रुख: राज्यपाल बिलों को अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि यदि कोई संवैधानिक प्राधिकारी, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहता है, तो अदालत "निष्क्रिय" नहीं बैठेगी. भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने यह टिप्पणी राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए एक संदर्भ (रेफरेंस) की सुनवाई के अंतिम दिन की, जिसमें विपक्ष शासित राज्यों और उनके राज्यपालों के बीच महत्वपूर्ण विधेयकों को मंजूरी देने में देरी को लेकर तनाव पर प्रकाश डाला गया.
मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा, "कोई भी प्राधिकारी, चाहे वह कितना भी उच्च क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है. मैं सत्ता के पृथक्करण सिद्धांत में दृढ़ विश्वास रखता हूँ. न्यायिक सक्रियता को न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलना चाहिए, लेकिन अगर लोकतंत्र का एक अंग अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहता है, तो क्या संविधान का संरक्षक होने के नाते अदालत निष्क्रिय और शक्तिहीन रहने को मजबूर होगी?"
यह टिप्पणी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा केंद्र सरकार की ओर से दी गई दलीलों के जवाब में आई, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 8 के फैसले की आलोचना की थी. इस फैसले में कोर्ट ने राज्यपालों और राष्ट्रपति को विधेयकों पर सहमति या विचार के लिए तीन महीने की समय सीमा निर्धारित की थी.
मेहता ने तर्क दिया कि सभी विधेयकों के लिए एकसमान समय सीमा लागू करना "स्वयं-विनाशकारी" हो सकता है, क्योंकि प्रत्येक विधेयक की अपनी विशिष्ट परिस्थितियाँ होती हैं. उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में राज्य सरकारें जन दबाव में विधेयक पारित करती हैं, जो बाद में राज्य के लिए हानिकारक हो सकता है, और ऐसे में राज्यपाल को विचार-विमर्श के लिए समय चाहिए.
न्यायमूर्ति कांत ने जवाब में कहा, "हम राज्यपाल को किसी विशेष तरीके से निर्णय लेने के लिए नहीं कह सकते, लेकिन अदालत निश्चित रूप से राज्यपाल को निर्णय लेने का निर्देश दे सकती है."
मेहता ने यह भी दावा किया कि पिछले 50 वर्षों में अधिकांश विधेयकों को राज्यपालों ने एक महीने के भीतर मंजूरी दे दी है. उन्होंने तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए कहा कि 10 विवादित विधेयकों को छोड़कर, बाकी को आमतौर पर एक महीने में मंजूरी मिल गई.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने राज्यपालों की भूमिका को राज्यों के साथ सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व के रूप में देखा था. उन्होंने टिप्पणी की, "संविधान निर्माताओं की अपेक्षा थी कि राज्यपालों की नियुक्ति में राज्यों को विश्वास में लिया जाएगा."
सॉलिसिटर जनरल ने दिल्ली सरकार का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्यपालों के खिलाफ रिट याचिकाएँ दायर करने की प्रवृत्ति हाल ही में शुरू हुई है. उन्होंने पूछा, "क्या कांग्रेस या कम्युनिस्ट शासित राज्यों से ऐसी याचिकाएँ आती हैं?"
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने सुझाव दिया कि राज्यपाल को विधेयक की संवैधानिकता की जाँच करने के बाद उसे मंजूरी देने या रोकने का विवेक होना चाहिए. मुख्य न्यायाधीश ने जवाब में कहा, "यदि राज्यपाल किसी विधेयक को रोकता है और इसके बारे में कोई संदेश नहीं भेजता, तो क्या वह अनिश्चितकाल तक ऐसा कर सकता है?"
राष्ट्रपति संदर्भ पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया है.