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होर्मुज की खाड़ी, पेट्रो-डॉलर और पेट्रो-युआन की जंग

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08 अप्रै. 2026, 07:15 AM 4 मिनट में पढ़ें 1

डॉलर-युनान
डॉलर-युनान

नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के जारी सैन्य संघर्ष ने न केवल मध्य पूर्व के भूगोल को दहला दिया है, बल्कि इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की उस धुरी को भी हिला दिया है जो दशकों से अमेरिकी डॉलर के इर्द-गिर्द घूमती रही है. दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम और कूटनीतिक वार्ताओं के बीच, ईरान और चीन ने मिलकर एक ऐसी आर्थिक बिसात बिछाई है, जिसका सीधा लक्ष्य अमेरिकी वित्तीय प्रभुत्व के सबसे बड़े स्तंभ 'पेट्रो-डॉलर' को ध्वस्त करना है. 


इस महाजंग का नया केंद्र बनी है होरमुज की खाड़ी, जहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल और तरल प्राकृतिक गैस गुजरती है. ईरान ने इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपने नियंत्रण का लाभ उठाते हुए एक 'डी-फैक्टो टोल बूथ' व्यवस्था लागू की है, जिसके तहत व्यापारिक जहाजों से पारगमन शुल्क अब अमेरिकी डॉलर के बजाय चीनी मुद्रा 'युआन' में वसूला जा रहा है. यह कदम केवल एक व्यापारिक बदलाव नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में आने वाले उस बड़े भूकंप की आहट है, जिसे अर्थशास्त्री 'डी-डॉलरलाइजेशन' का नाम दे रहे हैं.


डॉलर की हेगमनी और ईरान-चीन का साझा एजेंडा


दशकों से वाशिंगटन ने डॉलर की वैश्विक स्वीकार्यता को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है. जेपी मॉर्गन चेस के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत तेल सौदे डॉलर में होते हैं. इसी ताकत के बल पर अमेरिका किसी भी देश को वैश्विक बैंकिंग प्रणाली (SWIFT) से काटकर उसकी अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने की क्षमता रखता है. ईरान और चीन दोनों ही इस 'डॉलर कूटनीति' के शिकार रहे हैं. 


तेहरान के लिए युआन को अपनाना अमेरिकी प्रतिबंधों की बेड़ियों को काटने का एक तरीका है, वहीं बीजिंग के लिए यह युआन को एक वैश्विक आरक्षित मुद्रा (Global Reserve Currency) के रूप में स्थापित करने का स्वर्णिम अवसर है. हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर केनेथ रोगोफ़ के अनुसार, ईरान इस कदम के जरिए न केवल अमेरिका की आंखों में धूल झोंक रहा है, बल्कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित करने के लिए चीन के साथ मिलकर एक नई बहुध्रुवीय वित्तीय प्रणाली की नींव रख रहा है.


होरमुज की खाड़ी: चीन के युआन का नया लॉन्चपैड


होरमुज की खाड़ी में युआन की स्वीकार्यता का सीधा अर्थ है 'पेट्रो-युआन' का उदय. ईरान के दूतावास ने हाल ही में स्पष्ट संकेत दिए कि अब वैश्विक तेल बाजार में युआन की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. चीन पहले से ही ईरान के तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खरीदता है, और इन सौदों का निपटान अब बड़े पैमाने पर युआन में किया जा रहा है. बदले में, ईरान चीन से भारी मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और औद्योगिक कलपुर्जे आयात कर रहा है. 


यह एक ऐसा पूर्ण चक्र है जहाँ डॉलर की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती. लॉयड्स लिस्ट और चीन के वाणिज्य मंत्रालय की रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि वाणिज्यिक जहाजों ने युआन में भुगतान करना शुरू कर दिया है. यह प्रक्रिया चीन के उस 25 वर्षीय रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा है, जो 2021 में हस्ताक्षरित हुई थी और अब युद्ध के साये में और अधिक मजबूत होकर उभरी है.


पेट्रो-डॉलर की ढाल और युआन की चुनौतियां


हालांकि, पेट्रो-डॉलर के साम्राज्य को ढहाना इतना आसान नहीं है. 'पेट्रो-डॉलर' की नींव 1970 के दशक में सऊदी अरब और अमेरिका के बीच हुए उस ऐतिहासिक समझौते पर टिकी है, जिसमें सुरक्षा की गारंटी के बदले तेल का व्यापार केवल डॉलर में करने की शर्त थी. आज भी वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 57 प्रतिशत है, जबकि युआन मात्र 2 प्रतिशत के आसपास संघर्ष कर रहा है. 


चीन की मुद्रा के साथ सबसे बड़ी समस्या इसका 'फ्री कनवर्टिबल' न होना है. बीजिंग के सख्त पूंजी नियंत्रण और विनियामक अस्पष्टता के कारण अंतरराष्ट्रीय निवेशक और बैंक अब भी युआन पर पूरी तरह भरोसा करने से कतराते हैं. इसके बावजूद, वैश्विक दक्षिण (Global South) के कई देश, जो अमेरिकी प्रतिबंधों की मार से आशंकित रहते हैं, धीरे-धीरे वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं.


भविष्य का वैश्विक वित्तीय परिदृश्य


इस जंग का भविष्य काफी हद तक मौजूदा युद्ध के परिणाम पर निर्भर करेगा. यदि ईरान इस संघर्ष के बीच अपने जलमार्गों पर युआन की वसूली को सामान्य बना देता है, तो यह डॉलर की सर्वोच्चता में एक स्थायी दरार पैदा कर देगा. नैटिक्सिस की मुख्य अर्थशास्त्री एलिसिया गार्सिया-हेरेरो का मानना है कि यह कदम रातों-रात डॉलर को विस्थापित नहीं करेगा, लेकिन यह ऊर्जा प्रवाह के लिए एक नए 'नॉर्मल' को जन्म दे रहा है. 


यदि अन्य खाड़ी देश भी इस राह पर चलते हैं, तो अमेरिकी डॉलर का युग समाप्त होने की प्रक्रिया तेज हो जाएगी. अंततः, होरमुज की खाड़ी में चल रहा यह खेल केवल जहाजों के आने-जाने का नहीं है, बल्कि यह इस बात का फैसला करेगा कि भविष्य में दुनिया का व्यापार किस मुद्रा के इशारों पर नाचेगा. अमेरिकी प्रभुत्व का शिखर अब ढलान की ओर है, और पेट्रो-युआन उस ढलान को और अधिक तीव्र बनाने का काम कर रहा है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP