श्रीलंका: 2022 जैसे आर्थिक संकट की आहट, ईंधन और भोजन की भारी किल्लत
कैंडी । डेस्क: मध्य श्रीलंका के पहाड़ी शहर कैंडी की सड़कों पर इन दिनों एक बार फिर वैसी ही लंबी और घुमावदार कतारें दिखाई दे रही हैं, जिन्होंने चार साल पहले पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था. 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद शुरू हुए युद्ध ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को एक बार फिर घुटनों पर ला दिया है. सामरिक रूप से महत्वपूर्ण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से होने वाली आपूर्ति ठप होने के कारण 22 मिलियन की आबादी वाला यह द्वीप राष्ट्र गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है.
वर्तमान में सरकार ने मोटरसाइकिलों के लिए 8 लीटर, टुक-टुक के लिए 20 लीटर और कारों के लिए 25 लीटर प्रति सप्ताह का राशन निर्धारित किया है. हालांकि श्रीलंका के पास वर्तमान में विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, लेकिन युद्ध के कारण तेल के जहाज उसके तटों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.
यह स्थिति 2022 के उस आर्थिक संकट की याद दिलाती है जब तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के खिलाफ जन-आंदोलन हुआ था. हालांकि, इस बार जनता का मिजाज थोड़ा अलग है. 2024 में चुनी गई अनुरा दिसानायके की वामपंथी सरकार को लोग सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं मान रहे हैं, क्योंकि यह संकट बाहरी युद्ध के कारण उपजा है.
इसके बावजूद, सरकार के सामने चुनौतियां हिमालय जैसी ऊंची हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल और गैस गुजरता है, और श्रीलंका अपनी ऊर्जा जरूरतों का 60 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है.
आपूर्ति बाधित होने से देश में ईंधन की कीमतों में 33 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी हुई है. इसका सीधा असर परिवहन और माल ढुलाई पर पड़ा है. बस किराए में 12 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है, जिससे निम्न-आय वर्ग के लोगों की कमर टूट गई है.
संकट केवल ईंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अब श्रीलंका की खाद्य सुरक्षा पर भी हमला कर रहा है.
दुनिया का लगभग आधा यूरिया होर्मुज के रास्ते ही आता है. कृषि विशेषज्ञों और कील इंस्टीट्यूट फॉर द वर्ल्ड इकॉनमी के शोधकर्ताओं का अनुमान है कि श्रीलंका में खाद्य कीमतों में 15 प्रतिशत तक का उछाल आ सकता है. उर्वरक की कमी और परिवहन लागत बढ़ने से खेती और खाद्य वितरण प्रणाली बुरी तरह प्रभावित हुई है.
इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने 'नो-वर्क-ऑन-वेडनेसडे' (बुधवार को काम नहीं) नीति लागू की है, जिसके तहत ईंधन बचाने के लिए बुधवार को सरकारी कार्यालय और स्कूल बंद रखे जा रहे हैं. कैबिनेट प्रवक्ता नलिंदा जयतिस्सा के अनुसार, सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में कम कीमतों पर तेल बेचकर जनता को सब्सिडी दे रही है, जिससे सरकारी खजाने को हर महीने लगभग 63 मिलियन डॉलर का घाटा हो रहा है.
भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए श्रीलंका अब रूस जैसे वैकल्पिक स्रोतों की ओर देख रहा है. रूसी उप ऊर्जा मंत्री रोमन मार्शाविन की हालिया कोलंबो यात्रा इसी दिशा में एक कदम है.
राजनीतिक अर्थशास्त्री शिरान इलानपेरुमा का मानना है कि श्रीलंका को मध्यम अवधि में अपनी भंडारण क्षमता बढ़ानी होगी, क्योंकि वर्तमान में देश के पास केवल एक महीने का स्टॉक रखने की सुविधा है.
हालांकि सरकार त्रिकोमाली में पुराने तेल टैंक फार्मों के नवीनीकरण के लिए भारत और यूएई के साथ मिलकर काम कर रही है, लेकिन तत्काल राहत के आसार कम ही दिख रहे हैं.
रसोई गैस (LPG) की भी भारी किल्लत है और कीमतें 8 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं, जिससे घरों में चूल्हा जलना मुश्किल हो गया है. श्रीलंका के लिए यह समय एक अग्निपरीक्षा जैसा है, जहां उसे अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कूटनीतिक और आंतरिक दोनों मोर्चों पर कड़े फैसले लेने होंगे.