'SIR' प्रक्रिया: फॉर्म 6 और फॉर्म 7 के नियमों को लेकर उठे गंभीर सवाल
नई दिल्ली । डेस्क: देशभर में निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) अभियान को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में घमासान मच गया है. लाखों मतदाताओं के नाम हटाने और नए नाम जोड़ने की इस कवायद ने अब एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है. इस पूरे विवाद के केंद्र में मुख्य रूप से दो फॉर्म हैं- नया मतदाता बनने के लिए इस्तेमाल होने वाला 'फॉर्म 6' और किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने या उस पर आपत्ति जताने वाला 'फॉर्म 7'.
विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इन फॉर्मों से जुड़े नियमों और उनकी ऑनलाइन प्रक्रियाओं में किए गए बदलावों ने जहां आम नागरिकों के लिए पंजीकरण कठिन कर दिया है, वहीं फर्जी आपत्तियों के जरिए वैधानिक मतदाताओं के नाम काटे जाने का खतरा बढ़ा दिया है.
फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा को लेकर क्यों मचा है बवाल?
नया मतदाता बनने के लिए अनिवार्य फॉर्म 6 में इस बार एक नया नियम जोड़ा गया है, जिसके तहत आवेदकों को यह साबित करना होगा कि उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पुरानी पुनरीक्षण सूचियों में दर्ज था या नहीं. इस अतिरिक्त शर्त को लेकर आयोग पर संसदीय नियमों के उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं. नियमत: संसद की मंजूरी के बिना फॉर्म के प्रारूप में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता.
संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने संवैधानिक परंपराओं और कानूनों को ताक पर रखकर यह बदलाव कराया है. उन्होंने तो यहां तक सवाल उठाया कि किस आधार पर इस सॉफ्टवेयर बदलाव को निजी कंपनियों से लागू कराया गया. विवाद बढ़ने पर निर्वाचन आयोग ने सफाई दी है कि यह घोषणा केवल SIR अवधि के दौरान ही लागू है और जहां यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां से इसे हटा दिया गया है. हालांकि, आयोग के भीतर से ही चुनाव आयुक्तों द्वारा इस बदलाव पर आपत्ति जताने की खबरें भी सामने आई हैं.
कर्नाटक में फॉर्म 7 के कथित दुरुपयोग पर प्राथमिकी और जांच की मांग
विवाद का दूसरा और बेहद संवेदनशील पहलू फॉर्म 7 से जुड़ा है. कर्नाटक में बड़े पैमाने पर फॉर्म 7 जमा कर अल्पसंख्यक और वंचित वर्ग के मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिशों के आरोप सामने आए हैं. राज्य के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस मामले में आपराधिक जांच की मांग करते हुए कहा है कि यह एक संगठित साजिश का हिस्सा है. कई क्षेत्रों में केवल कुछ ही व्यक्तियों द्वारा हजारों फॉर्म 7 जमा किए जाने का मामला सामने आया है, जिनमें से अधिकतर आपत्तियां मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं के खिलाफ दर्ज की गई थीं.
बेलगावी में तो सालों से बूथ लेवल एजेंट के रूप में काम कर रहे लोगों ने भी पाया कि उनके और उनके परिवारों के नाम हटाने के लिए पूर्व-भरे हुए आवेदन जमा कर दिए गए थे. आरोप है कि बीएलओ अधिकारियों पर इन फॉर्मों पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया गया. इस तरह की थोक आपत्तियों के बाद राज्य सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए चुनावी मशीनरी के दुरुपयोग पर कड़ी कार्रवाई करने का भरोसा दिया है.
पश्चिम बंगाल में आवेदनों के निपटारे पर आंकड़े बढ़ा रहे हैं संदेह
यह विवाद सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल में भी इसको लेकर तीखी राजनीति देखने को मिल चुकी है. राज्य में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहले ही फर्जी आपत्तियों के जरिए वैध मतदाताओं के नाम काटने का आरोप लगाया था. हालिया आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि फॉर्म 6 के तहत नए पंजीकरण के कुल आवेदनों में से बेहद कम प्रतिशत को ही स्वीकृति मिली, जबकि इसके विपरीत फॉर्म 7 के तहत नाम हटाने के लिए आए आवेदनों में से बहुसंख्यक आपत्तियों को स्वीकार कर लिया गया.
हालांकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि आपत्तियों पर कार्रवाई पूरी तरह से जांच और सबूतों पर आधारित होती है, लेकिन आंकड़ों का यह अंतर आलोचकों के दावों को बल दे रहा है. विपक्षी दलों का कहना है कि बिना ठोस सबूत के नाम हटाने की ऐसी प्रक्रिया से असली भारतीय नागरिकों के मताधिकार पर संकट मंडरा रहा है.
पारदर्शिता पर उठे सवाल और निर्वाचन आयोग का रुख
पूरे मामले पर निर्वाचन आयोग ने अपना बचाव करते हुए कहा है कि फॉर्म 6 से जुड़े बदलावों को अदालत की वैधता हासिल है और आयोग के भीतर विचार-विमर्श के बाद ही फैसले लिए जाते हैं. हालांकि, चुनाव निकाय पर पारदर्शिता की कमी के आरोप लगातार मजबूत हो रहे हैं. मांग उठ रही है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया और बैठकों के मिनट्स को सार्वजनिक किया जाए ताकि प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रहे.