रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

बदली रणनीति: क्या अब अपनी रक्षा खुद करेगा दक्षिण कोरिया?

C

CG Khabar

14 मार्च 2026, 07:11 PM 5 मिनट में पढ़ें 1

राष्ट्रपति ली जे-म्युंग
राष्ट्रपति ली जे-म्युंग

सियोल । डेस्क: दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने हाल ही में एक ऐसा बयान दिया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. उन्होंने बहुत ही साफ शब्दों में स्वीकार किया है कि दक्षिण कोरिया अपने देश में तैनात अमेरिकी सेना की आवाजाही को रोकने की ताकत नहीं रखता. यह बात सुनकर आम जनता और रक्षा विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है. 


दरअसल, यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब खबरें आईं कि अमेरिका ने दक्षिण कोरिया में तैनात अपनी घातक 'थाड' (THAAD) मिसाइल डिफेंस प्रणाली के कुछ हिस्सों को वहां से हटाकर मिडिल ईस्ट भेज दिया है. दक्षिण कोरिया की सरकार ने इस पर आपत्ति जताई थी, लेकिन राष्ट्रपति ली ने कैबिनेट की बैठक में खुलकर कहा कि हकीकत यह है कि हम अपनी बात को पूरी तरह मनवा नहीं सकते.

विज्ञापन


यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कई दशकों से दक्षिण कोरिया की सुरक्षा का बड़ा जिम्मा अमेरिका पर रहा है. वहां लगभग 28,500 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जिनका मुख्य काम उत्तर कोरिया के किसी भी हमले को रोकना रहा है. लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. 


जानकारों का कहना है कि अमेरिका अब अपनी सेना का इस्तेमाल सिर्फ उत्तर कोरिया को डराने के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अपने हितों की रक्षा के लिए करना चाहता है. इसे 'स्ट्रैटेजिक फ्लेक्सिबिलिटी' या रणनीतिक लचीलापन कहा जाता है. 


इसका सीधा मतलब यह है कि दक्षिण कोरिया में मौजूद अमेरिकी सैनिक अब जरूरत पड़ने पर चीन के खिलाफ या दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से में लड़ने के लिए भेजे जा सकते हैं. राष्ट्रपति ली ने स्वीकार किया कि यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिससे अब देश को रूबरू होना ही पड़ेगा.


हालांकि, राष्ट्रपति ने आम जनता को भरोसा दिलाने की कोशिश भी की है. उन्होंने कहा कि अमेरिका द्वारा कुछ हथियारों को हटाने से दक्षिण कोरिया की सुरक्षा कमजोर नहीं होगी. उन्होंने गर्व के साथ बताया कि आज दक्षिण कोरिया का सैन्य बजट दुनिया के पांच सबसे बड़े देशों में शामिल है. मजे की बात यह है कि दक्षिण कोरिया अकेले अपनी सेना पर जितना खर्च करता है, वह उत्तर कोरिया की पूरी अर्थव्यवस्था (जीडीपी) से भी लगभग डेढ़ गुना ज्यादा है. 


राष्ट्रपति का मानना है कि दक्षिण कोरिया की अपनी सेना इतनी ताकतवर हो चुकी है और उनके पास इतने आधुनिक हथियार हैं कि वे किसी भी खतरे का सामना अकेले कर सकते हैं. उन्होंने अपने सैनिकों के ऊंचे हौसले और देश के बढ़ते हथियार उद्योग का भी जिक्र किया ताकि लोगों के मन से डर निकल सके.


लेकिन इस पूरे मामले के पीछे एक गहरा डर भी छिपा है. राष्ट्रपति ली ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अंतरराष्ट्रीय हालात तेजी से बदल रहे हैं. उन्होंने कहा कि हमें उस 'सबसे बुरे वक्त' के लिए तैयार रहना चाहिए जब शायद हमें बाहर से मिलने वाली मदद बंद हो जाए. उनका इशारा साफ था कि दक्षिण कोरिया को अब किसी दूसरे देश के भरोसे बैठने के बजाय 'आत्मनिर्भर रक्षा' की ओर बढ़ना होगा. 


उन्होंने कहा कि जैसे हम शांति के समय भी युद्ध की तैयारी करते हैं, वैसे ही हमें खुद को इतना मजबूत बनाना होगा कि किसी भी बाहरी देश की सेना के चले जाने पर भी हम अपनी रक्षा खुद कर सकें. यह एक तरह से दक्षिण कोरियाई लोगों के लिए 'वेक-अप कॉल' या जागने का समय है, क्योंकि अब तक वे अमेरिका की सुरक्षा छतरी के नीचे खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करते थे.


इस स्थिति का एक दूसरा पहलू चीन के साथ जुड़ा है. विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति ली ने यह बयान सोच-समझकर दिया है ताकि चीन को यह संकेत दिया जा सके कि दक्षिण कोरिया अपनी मर्जी से अमेरिका को अपनी जमीन का इस्तेमाल चीन के खिलाफ नहीं करने देना चाहता. 


असल में, पिछले महीने पीले सागर में अमेरिकी और चीनी विमानों के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी, जिससे सियोल काफी नाराज था क्योंकि अमेरिका ने इस युद्धाभ्यास की पूरी जानकारी दक्षिण कोरिया को नहीं दी थी. अब जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं, तो दक्षिण कोरिया यह साफ करना चाहता है कि वह दो महाशक्तियों की लड़ाई के बीच में नहीं फंसना चाहता.


कुल मिलाकर, राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की यह बेबाकी बताती है कि दक्षिण कोरिया अब अपनी विदेश नीति और सुरक्षा के मामले में एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. दशकों तक अमेरिका का छोटा साझीदार बनकर रहने के बाद, अब सियोल अपनी ताकत पहचानने और अपनी शर्तों पर जीने की कोशिश कर रहा है. 


यह खबर हर आम नागरिक के लिए यह संदेश देती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी दोस्ती स्थाई नहीं होती और अंत में एक देश को अपनी सुरक्षा के लिए अपने ही पैरों पर खड़ा होना पड़ता है. राष्ट्रपति का यह कबूलनामा कि अमेरिका अपनी मर्जी का मालिक है, दक्षिण कोरिया को खुद को और ताकतवर बनाने की प्रेरणा दे रहा है, ताकि भविष्य में उसे किसी के सामने बेबस न होना पड़े.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP