समुद्र के बढ़ते जलस्तर पर वैज्ञानिकों की नई चेतावनी
नई दिल्ली । डेस्क: समुद्र के बढ़ते जलस्तर को लेकर दुनिया भर में जो अनुमान अब तक लगाए गए थे, वे जमीनी हकीकत से कोसों दूर हो सकते हैं. हाल ही में यूरोप के वैज्ञानिकों के एक समूह द्वारा किए गए शोध में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि पिछली गणनाओं में बड़ी तकनीकी खामियां थीं. 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत तटीय क्षेत्रों में समुद्र के जलस्तर की ऊंचाई को वास्तव में एक फुट तक कम आंका गया था.
कुछ संवेदनशील इलाकों, विशेषकर भारत-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में तो यह अंतर तीन फुट तक पाया गया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि उपग्रह तकनीक से तटीय ऊंचाई मापने के पुराने तरीके सटीक नहीं थे, क्योंकि वे समुद्र और स्थल के मिलन बिंदु पर होने वाली जटिल भौगोलिक हलचलों को पूरी तरह पकड़ पाने में असमर्थ रहे.
इस नई और संशोधित गणना ने जलवायु परिवर्तन के खतरों को और अधिक भयावह बना दिया है.
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस सदी के अंत तक पहले के अनुमान के मुकाबले 37 प्रतिशत अधिक तटीय भूमि समुद्र के पानी में समा सकती है. इसका सीधा असर दुनिया की 7 से 13 करोड़ अतिरिक्त आबादी पर पड़ेगा, जिनका जीवन और आशियाना सीधे तौर पर खतरे की जद में आ जाएगा.
नीदरलैंड के प्रोफेसर फिलिप मिंडरहुड ने बताया कि पहले समुद्र और तट की ऊंचाई को अलग-अलग मापा गया था, जो एक बड़ी भूल थी. अब विशेषज्ञों का मानना है कि सटीक गणना के लिए समुद्र की लहरों, धाराओं, हवा के रुख, तापमान में बदलाव और 'एल नीनो' जैसे कारकों को शामिल करना अनिवार्य है.
इस अध्ययन के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया इस खतरे के केंद्र में है. भारत और प्रशांत महासागर के तटीय इलाकों में जलस्तर बढ़ने की दर अटलांटिक या यूरोप के तटों की तुलना में कहीं अधिक है.
दक्षिण प्रशांत द्वीप समूह के पर्यावरणविद् वेपाइयामेले ट्रिफ का कहना है कि ये केवल कागजी आंकड़े नहीं हैं, बल्कि तटीय समुदायों की कड़वी हकीकत है जो हर दिन समुद्र को अपनी ओर बढ़ते देख रहे हैं.
हालांकि, वैज्ञानिक समुदाय में इस शोध को लेकर मतभेद भी हैं. फ्रांस के वैज्ञानिक गोनेरी ले कोज़ानेट और अमेरिकी विशेषज्ञ रॉबर्ट कॉप का तर्क है कि यह अध्ययन खतरों को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है.
उनका कहना है कि दुनिया अब जलस्तर वृद्धि को लेकर जागरूक है और बचाव की योजनाएं पहले ही तैयार की जा चुकी हैं. फिर भी, यूनेस्को की हालिया रिपोर्ट और इस नए शोध ने वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय डेटा की सटीकता और भविष्य की तैयारियों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है.