डॉलर के मुकाबले रुपया 90.02 का हुआ
नई दिल्ली । डेस्क: भारतीय रुपये ने बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहली बार 90 के ऐतिहासिक स्तर को पार कर लिया. शुरुआती कारोबार में यह 6 पैसे गिरकर 90.02 पर खुला, क्योंकि बैंक लगातार ऊंचे स्तर पर डॉलर खरीदते रहे और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निकासी जारी रही.
एशिया की प्रमुख मुद्राओं में रुपये ने साल भर में सबसे खराब प्रदर्शन किया है, जो डॉलर के मुकाबले 5 प्रतिशत गिर चुका है. इसका मुख्य कारण अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर 50 प्रतिशत तक के भारी टैरिफ हैं, जो भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजार को प्रभावित कर रहे हैं और विदेशी निवेशकों का रुझान भारतीय शेयर बाजार से हट रहा है.
इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये ने 89.96 पर खुलने के बाद इंट्राडे में 90.15 का रिकॉर्ड नया निचला स्तर छुआ, लेकिन बाद में कुछ सुधार के साथ 90.02 पर कारोबार कर रहा था.
मंगलवार को यह 43 पैसे गिरकर 89.96 के अब तक के सबसे निचले समापन स्तर पर बंद हुआ था, जो सट्टेबाजों के शॉर्ट कवरिंग और आयातकों की लगातार डॉलर मांग से प्रेरित था.
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के ट्रेजरी प्रमुख और कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली ने कहा, "रुपया कमजोर हो रहा है क्योंकि भारत सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) निर्यातकों की मदद के लिए डॉलर को ऊंचे स्तर पर रखने की कोशिश कर रहे हैं. मंगलवार को राष्ट्रीयकृत बैंकों ने लगातार ऊंचे स्तर पर डॉलर खरीदे... बाजार बंद होने के बाद ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर 90.0050 पर एक सौदा हुआ. भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता का ठहराव और भारी FPI निकासी के बावजूद कमजोर डॉलर इंडेक्स से रुपये की गिरावट हो रही है."
भंसाली ने चेतावनी दी कि अगर RBI 90 के स्तर पर समर्थन कमजोर कर देता है, तो रुपये का स्तर इस चक्र में 91 तक पहुंच सकता है. मंगलवार से शुरू हो रही मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में 5 दिसंबर को ब्याज दर का फैसला आएगा, जबकि फेड का फैसला 10 दिसंबर को होगा. उन्होंने कहा, "RBI द्वारा ब्याज दर कटौती से रुपये में और बिकवाली आ सकती है."
उधर, डॉलर इंडेक्स, जो डॉलर की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले ताकत को मापता है, 0.13 प्रतिशत गिरकर 99.22 पर कारोबार कर रहा था. वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट कच्चा तेल वायदा व्यापार में 0.03 प्रतिशत गिरकर प्रति बैरल 62.43 डॉलर पर था.
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-अमेरिका व्यापार तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच RBI को रुपये को स्थिर करने के लिए हस्तक्षेप बढ़ाना पड़ सकता है. निवेशक फेड और RBI के फैसलों पर नजर रखे हुए हैं.