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मोहन भागवत ने की स्वदेशी अपनाने की अपील

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27 अग. 2025, 07:51 PM 3 मिनट में पढ़ें 2

मोहन भागवत
मोहन भागवत

नई दिल्ली । डेस्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने बुधवार (27 अगस्त 2025) को दिल्ली के विज्ञान भवन में अपने तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला के दूसरे दिन स्वदेशी उत्पादों को अपनाने और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार स्वैच्छिक सहयोग पर आधारित होना चाहिए, न कि किसी दबाव पर. यह बयान ऐसे समय में आया जब अमेरिका ने भारत पर 25% अतिरिक्त शुल्क लागू किया, जिससे कुल शुल्क 50% हो गया.


भागवत ने कहा, “हमें स्वदेशी को बढ़ावा देना चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए. आत्मनिर्भरता का मतलब आयात-निर्यात बंद करना नहीं है. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार जारी रहेगा, लेकिन यह दबाव में नहीं, बल्कि स्वैच्छिक सहयोग पर आधारित होना चाहिए.” उन्होंने लोगों से पहले स्थानीय उत्पादों, फिर अन्य राज्यों के उत्पादों और उसके बाद ही विदेशी उत्पादों को चुनने की अपील की.

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उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “कोका-कोला जैसे सॉफ्ट ड्रिंक की जगह घर का बना नींबू पानी पिएं. स्थानीय बाजारों से सामान खरीदें, क्योंकि इससे आपके अपने लोगों के घर चलते हैं. सस्ता पेट्रोल लेने के लिए दूसरे राज्यों में जाने की जरूरत नहीं है.”


भागवत ने राष्ट्र निर्माण पर भी जोर दिया और कहा कि भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र के लिए जीना चाहिए. 


उन्होंने कहा, “स्वतंत्रता संग्राम में हमारे पास देश के लिए मरने का विकल्प था, लेकिन अब हमें देश के लिए जीना है. देश को स्वच्छ रखें, स्थानीय उत्पाद चुनें, पड़ोसियों की मदद करें, प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय न करें, अपनी मातृभाषा में बोलें और बच्चों को भी यही सिखाएं. नियमों का पालन करें, लाइसेंस समय पर नवीनीकृत करें, ट्रैफिक नियमों का पालन करें और यदि कोई उकसाए तो पुलिस के पास जाएं.”


उन्होंने जातिगत भेदभाव को समाज और राष्ट्र के लिए हानिकारक बताते हुए कहा कि इसे खत्म करने के लिए सभी को अपने पड़ोसियों से मिलना चाहिए, चाहे वे किसी भी वर्ग के हों. “जाति एक बुराई है, लेकिन हम इसकी मौजूदगी से इनकार नहीं कर सकते. इसे खत्म करने के लिए हमें सभी के साथ एकसमान व्यवहार करना होगा. सभी के लिए मंदिर, पानी और श्मशान एक होने चाहिए,” उन्होंने कहा.


भागवत ने पड़ोसी देशों के साथ सांस्कृतिक एकता पर भी जोर दिया. 


उन्होंने कहा, “हमारे अधिकांश पड़ोसी देश कभी भारत का हिस्सा थे. भले ही नक्शे पर रेखाएं खींच दी गई हों, लेकिन हमारी संस्कृति, नदियां और जंगल एक हैं. भारत सबसे बड़ा पड़ोसी देश है, इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके शांति, स्थिरता और विकास को सुनिश्चित करें.”


उन्होंने विश्व में बढ़ती असहिष्णुता और चरमपंथ पर चिंता जताई और इसे ‘वोकिज्म’ और ‘कैंसिल कल्चर’ से जोड़ा. “अगर हम उनके विचारों का समर्थन नहीं करते, तो वे हमें रद्द कर देते हैं. यह बच्चों पर सबसे ज्यादा असर डाल रहा है, जो माता-पिता के लिए चिंता का विषय है,” उन्होंने कहा.


इससे पहले, भागवत ने कहा था कि अखंड भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए पिछले 40,000 वर्षों से एकसमान है और समावेशिता भारतीय संस्कृति का हिस्सा है. उन्होंने बच्चों को स्विट्जरलैंड ले जाने से पहले नजदीकी मंदिरों और झुग्गी-झोपड़ियों में ले जाने की सलाह दी, ताकि उनमें विनम्रता और संवेदनशीलता आए.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP