अल नीनो की वापसी: 2026 में भारत और एशिया में सूखे का संकट
नई दिल्ली । डेस्क: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और विभिन्न वैश्विक मौसम एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि साल 2026 के दूसरे भाग में एक शक्तिशाली 'अल नीनो' प्रभाव विकसित हो सकता है, जिससे दुनिया भर के मौसम में बड़े बदलाव आने की संभावना है. पूर्वानुमानों के अनुसार, इस साल मई की शुरुआत से ही अल नीनो की स्थितियां बन सकती हैं, जिसका सबसे गहरा असर एशिया और ऑस्ट्रेलिया पर पड़ने की उम्मीद है.
भारत के लिए चिंता की बात यह है कि भारतीय मौसम अधिकारियों ने संकेत दिया है कि अल नीनो के कारण इस बार दक्षिण एशियाई मानसून पिछले तीन वर्षों में पहली बार सामान्य से कम रह सकता है, जिससे कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
जापान के मौसम ब्यूरो ने भी गर्मियों के दौरान अल नीनो उभरने की 70% संभावना जताई है, जबकि ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में तापमान सामान्य से अधिक और बारिश औसत से कम रहने का अनुमान है.
इसके विपरीत, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के कुछ हिस्सों में भारी बारिश होने की संभावना है, जो सोयाबीन और मक्का जैसी फसलों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है.
प्रशांत महासागर की सतह के गर्म होने की यह प्राकृतिक घटना आमतौर पर 9 से 12 महीने तक चलती है और इससे पहले 2015-16 और 1997-98 के दौरान आए भीषण अल नीनो ने दुनिया भर में सूखे और बाढ़ के जरिए अनाज, पाम ऑयल और चीनी के उत्पादन को भारी नुकसान पहुँचाया था.
अल नीनो (El Nino) क्या है?
अल नीनो (El Nino) प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक घटना है, जिसका सीधा असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है. आसान शब्दों में कहें तो, जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, तो उसे 'अल नीनो' कहा जाता है.
सामान्य स्थिति में समुद्र की लहरें और हवाएं गर्म पानी को एशिया की तरफ धकेलती हैं, लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं, जिससे गर्म पानी वापस अमेरिका के तटों की ओर बढ़ने लगता है. यह बदलाव हवा के दबाव और तापमान के पूरे चक्र को बिगाड़ देता है, जिससे दुनिया के एक हिस्से में भीषण सूखा पड़ता है तो दूसरे हिस्से में भारी बारिश और बाढ़ आती है.
भारत और एशिया के संदर्भ में अल नीनो अक्सर चिंता का विषय होता है क्योंकि यह मानसून को कमजोर कर देता है. जब प्रशांत महासागर गर्म होता है, तो भारत में होने वाली मानसूनी बारिश कम हो जाती है, जिससे फसलों को नुकसान पहुँचता है और गर्मी बढ़ जाती है.
वहीं दूसरी ओर, इसके प्रभाव से अमेरिका और दक्षिणी गोलार्ध के कुछ देशों में सामान्य से बहुत ज्यादा बारिश होती है. अल नीनो की यह घटना हर 3 से 5 साल में एक बार होती है और इसका असर करीब 9 से 12 महीनों तक रहता है.
यह केवल समुद्र का गर्म होना भर नहीं है, बल्कि एक ऐसा ग्लोबल चक्र है जो खेती, पीने के पानी की उपलब्धता और वैश्विक तापमान को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है.
ला-नीना (La Nina) क्या है?
ला-नीना (La Nina) अल-नीनो के ठीक विपरीत होने वाली एक प्राकृतिक घटना है, जो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के पानी के ठंडा होने से जुड़ी होती है. जब प्रशांत महासागर में चलने वाली व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) बहुत अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं, तो वे समुद्र की सतह के गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेल देती हैं.
इसके परिणामस्वरूप, समुद्र की गहराई से ठंडा पानी ऊपर की ओर आने लगता है, जिससे मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से काफी कम हो जाता है. आसान भाषा में कहें तो, जहाँ अल-नीनो गर्मी और सूखे का संकेत है, वहीं ला-नीना आमतौर पर दुनिया के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और ठंड लेकर आता है.
भारत के लिए ला-नीना को अक्सर सुखद माना जाता है क्योंकि इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव मानसून पर पड़ता है. ला-नीना के दौरान भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में सामान्य से अधिक बारिश होती है, जो खेती और जलाशयों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होती है.
हालांकि, दुनिया के दूसरे हिस्सों जैसे कि दक्षिणी अमेरिका और अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में इसकी वजह से सूखा पड़ सकता है. ला-नीना की यह प्रक्रिया हर 3 से 7 साल में एक बार होती है और कभी-कभी यह लगातार दो-तीन साल तक भी बनी रह सकती है. यह चक्र न केवल समुद्री जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि वैश्विक तापमान को भी अस्थायी रूप से थोड़ा कम करने में मदद करता है.