ईरान-अमेरिका तनाव का खामियाजा भुगत रहे हैं दुर्लभ अफ्रीकी व्हेल
नई दिल्ली । डेस्क: ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते युद्ध और तनाव ने न केवल वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, उर्वरक, दवाइयों और हीलियम की कमी से दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर दिया है, बल्कि अब इसका एक डरावना पर्यावरणीय पहलू भी सामने आया है. लाल सागर और स्वेज नहर में हूतियों के हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान व अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण जहाजों ने अपना रास्ता बदल लिया है.
अब दुनिया भर के मालवाहक जहाज मध्य पूर्व के बजाय दक्षिण अफ्रीका के 'केप ऑफ गुड होप' से होकर गुजर रहे हैं, जिससे वहां मौजूद व्हेल मछलियों के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है. हाल ही में इंटरनेशनल व्हेलिंग कमीशन (IWC) की बैठक में प्रस्तुत एक शोध के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिमी तट पर जहाजों की आवाजाही "अत्यधिक" बढ़ गई है, जिससे जहाजों की चपेट में आकर व्हेल मछलियों के मारे जाने का जोखिम कई गुना बढ़ गया है.
शिपिंग रूट में यह बड़ा बदलाव नवंबर 2023 से शुरू हुआ था, जब फिलिस्तीनियों के समर्थन में हूतियों ने जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया. अब ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध किए जाने के बाद स्थिति और भी विकट हो गई है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के 'पोर्टवॉच मॉनिटर' के आंकड़ों के मुताबिक, दक्षिण अफ्रीका के आसपास वाणिज्यिक जहाजों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है.
जहां 2023 में इस अवधि के दौरान 44 जहाज गुजरते थे, वहीं अब यह संख्या 89 के पार जा चुकी है. दक्षिण अफ्रीका का समुद्री क्षेत्र 40 से अधिक व्हेल प्रजातियों का घर है, जिनमें दक्षिणी राइट व्हेल, हंपबैक और ब्राइड व्हेल प्रमुख हैं. विशेष रूप से हंपबैक व्हेल के विशाल समूह, जिन्हें 'सुपर-पॉड्स' कहा जाता है, अंटार्कटिका की ओर अपने वार्षिक प्रवास के दौरान इसी क्षेत्र में भोजन करते हैं. कुछ अध्ययनों के अनुसार इनकी संख्या 11,000 से 13,000 के बीच है.
यूनिवर्सिटी ऑफ प्रिटोरिया की शोधकर्ता एल्स वर्मीयुलन के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जहाजों की तेज रफ्तार व्हेल्स के लिए काल बन रही है. अक्सर ये व्हेल भोजन की तलाश में इतनी मशगूल होती हैं कि उन्हें आने वाले जहाजों के खतरे का अंदाजा नहीं होता. वर्मीयुलन ने बताया कि जहाजों पर मौजूद लोग व्हेल्स के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, लेकिन वे यह नहीं समझ रहे कि तेज रफ्तार यातायात के कारण अनजाने में कई मछलियां टकराकर मर रही हैं.
विश्व वन्यजीव कोष (WWF) के विशेषज्ञों का कहना है कि व्हेल मछलियां जहाजों के शोर के प्रति हमेशा वैसा व्यवहार नहीं करतीं जैसा हम सोचते हैं; उदाहरण के लिए, नीली व्हेल शोर सुनकर भागने के बजाय समुद्र की सतह के ठीक नीचे चली जाती हैं, जो उन्हें टक्कर के प्रति और अधिक संवेदनशील बना देता है.
1999 से 2019 के बीच के आंकड़ों को देखें तो दर्ज की गई 97 मौतों में से 11 सीधे तौर पर जहाज की टक्कर से हुई थीं, हालांकि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है क्योंकि खुले समुद्र में टक्कर के बाद व्हेल अक्सर डूब जाती हैं. शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि यदि जहाजों के रास्तों (ट्रैफ़िक लेन) को तट से थोड़ा दूर हटा दिया जाए, तो इन मौतों को 20 से 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है.
कुछ वैश्विक कंपनियां जैसे स्विस-आधारित MSC ने पहले ही ग्रीस और श्रीलंका के पास व्हेल्स को बचाने के लिए अपने रास्ते बदल दिए हैं. दक्षिण अफ्रीका के पर्यावरण मंत्रालय ने भी आश्वासन दिया है कि वैज्ञानिक मूल्यांकन पूरा होने के बाद इन समुद्री जीवों को बचाने के लिए समुद्री मार्ग में बदलाव और गति नियंत्रण जैसे कड़े कदम उठाए जाएंगे.
फिलहाल, मानवीय युद्ध की कीमत बेजुबान समुद्री जीव अपने जीवन से चुका रहे हैं.