सोम, 19 अक्टू. 2026

CGKhabar

नाबालिग सौतेली बेटी से रेप: HC ने कहा- पीड़िता का बयान ही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त

C

CG Khabar

07 मई 2026, 08:02 AM 2 मिनट में पढ़ें 4

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए अपनी नाबालिग सौतेली बेटी के साथ बार-बार यौन शोषण और अमानवीय कृत्य करने वाले व्यक्ति की दोषसिद्धि और उसे मिली आजीवन कारावास की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर आरोपी की अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी नाबालिग पीड़िता का बयान सुसंगत, ठोस और विश्वसनीय पाया जाता है, तो वह बिना किसी अन्य स्वतंत्र साक्ष्य या बाहरी पुष्टि के भी अपराधी को सजा दिलाने के लिए अपने आप में पर्याप्त आधार है. 


यह हृदयविदारक मामला साल 2014 में शुरू हुआ था, जब आरोपी विश्वनाथ सोनी अपनी नाबालिग सौतेली बेटी को काम दिलाने के बहाने खैरबार स्थित एक सुनसान मकान में ले गया और वहां उसके साथ बलात्कार जैसी घिनौनी वारदात को अंजाम दिया. अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के अनुसार, आरोपी ने न केवल पीड़िता के साथ दरिंदगी की, बल्कि उसे जबरन पेशाब पीने के लिए भी विवश किया और यह सिलसिला करीब दो वर्षों तक लगातार चलता रहा. 

विज्ञापन


इस भयानक सच्चाई का खुलासा दिसंबर 2015 में तब हुआ, जब पीड़िता के स्कूल में 'चाइल्ड लाइन 1098' द्वारा एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस कार्यक्रम से प्रेरित होकर और हिम्मत जुटाकर पीड़िता ने सबसे पहले अपनी सहेली को आपबीती बताई और फिर चाइल्ड लाइन के कर्मियों को जानकारी दी, जिसके बाद अंबिकापुर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई. 


नवंबर 2018 में अंबिकापुर की विशेष अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 और पोक्सो (POCSO) अधिनियम की गंभीर धाराओं के तहत दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. 


हाईकोर्ट में बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि पीड़िता के बयानों में विरोधाभास है और मेडिकल साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया. 


उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि भारतीय सामाजिक परिवेश में किसी यौन उत्पीड़न पीड़िता के बयान पर संदेह करना उसे दोबारा अपमानित करने जैसा है. 


अदालत ने यह भी माना कि बच्चों के मामलों में डर या लोक-लाज के कारण घटना को बताने में देरी होना एक स्वाभाविक मानवीय व्यवहार है, इसे झूठा नहीं माना जा सकता. उच्च न्यायालय ने आरोपी की सजा को बरकरार रखते हुए, उसे तत्काल आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP