रायपुर: 11 वर्षीय बच्चे के दुर्लभ कैंसर का सफल ऑपरेशन, बनाया विश्व रिकॉर्ड
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय ने चिकित्सा जगत में एक अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है. अस्पताल के हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग ने एक 11 वर्षीय बच्चे के हृदय और फेफड़ों के बीच जकड़े हुए अत्यंत दुर्लभ और जटिल 'स्टेज-3 इनवेसिव थायमिक कैंसर' (टाइप-बी थायमोमा) का सफल ऑपरेशन कर विश्व स्तर पर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है.
यह मामला इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि वर्तमान मेडिकल जर्नल्स में इस प्रकार के आक्रामक कैंसर का सबसे कम उम्र का मरीज अब तक 12 वर्ष का दर्ज था, जबकि रायपुर के डॉक्टरों ने 11 साल के बच्चे का सफल उपचार कर इस रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है. इस सफल सर्जरी के छह महीने बाद बच्चा अब पूरी तरह स्वस्थ है और उसने न केवल स्कूल जाना शुरू कर दिया है, बल्कि अपनी कक्षा छठवीं की परीक्षा भी दी है.
विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू के नेतृत्व में की गई यह सर्जरी चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से किसी चमत्कार से कम नहीं मानी जा रही है. ट्यूमर की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह सामान्यतः 40 से 60 वर्ष की आयु के वयस्कों में पाया जाता है, बच्चों में इसका मिलना अत्यंत दुर्लभ है. चांपा निवासी इस मासूम को पिछले छह महीनों से सीने में दर्द, भारीपन और सांस फूलने की गंभीर समस्या थी.
जब उसे अम्बेडकर अस्पताल लाया गया, तब सीटी स्कैन में पता चला कि एक विशाल ट्यूमर ने उसके हृदय, पेरिकार्डियम (हृदय की झिल्ली), फ्रेनिक नर्व, महाधमनी (एओर्टा), मुख्य पल्मोनरी आर्टरी, लेफ्ट एट्रियम और फेफड़ों को अपनी चपेट में ले रखा था. प्रदेश के कई बड़े निजी अस्पतालों ने इस सर्जरी की जटिलता और जोखिम को देखते हुए हाथ खड़े कर दिए थे, क्योंकि ट्यूमर शरीर की मुख्य रक्त वाहिकाओं और हृदय के अंगों से इतनी बुरी तरह चिपका हुआ था कि उसे सुरक्षित निकालना लगभग असंभव माना जा रहा था.
डॉ. कृष्णकांत साहू ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए परिजनों को स्पष्ट कर दिया था कि यह ऑपरेशन जानलेवा साबित हो सकता है और इसे बीच में ही रोकना पड़ सकता है, लेकिन परिजनों के अटूट विश्वास के बाद सर्जरी का चुनौतीपूर्ण निर्णय लिया गया. लगभग चार घंटे तक चली इस मैराथन सर्जरी में डॉक्टरों ने 'ड्यूल एप्रोच' तकनीक का सहारा लिया.
ट्यूमर के विशाल आकार के कारण छाती की हड्डी (स्टर्नम) और पसली, दोनों स्थानों पर चीरा लगाया गया, जिसे चिकित्सा विज्ञान में स्टर्नोटॉमी और थोरेक्टोमी का संयोजन कहा जाता है. ऑपरेशन के दौरान किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए 'हार्ट-लंग मशीन' को स्टैंडबाय पर रखा गया था.
सर्जरी इतनी सूक्ष्म थी कि मुख्य ट्यूमर के साथ-साथ फेफड़े की प्लूरल कैविटी में फैले तीन अन्य छोटे सैटेलाइट ट्यूमर को भी निकाला गया ताकि भविष्य में कैंसर की पुनरावृत्ति न हो. करीब 400 ग्राम वजनी और 12x8 सेंटीमीटर आकार के इस ट्यूमर को निकालने के दौरान हृदय की झिल्ली और फेफड़े के कुछ हिस्सों को भी हटाना पड़ा और ट्यूमर से प्रभावित लेफ्ट एट्रियम की मरम्मत की गई.
सर्जरी के बाद पैथोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. राबिया परवीन सिद्दकी द्वारा की गई बायोप्सी में इसे 'इनवेसिव थायमिक कार्सिनोमा' (स्टेज-3) के रूप में प्रमाणित किया गया. इसके उपरांत कैंसर विभाग ने बच्चे को 25 चक्रों की रेडिएशन थेरेपी प्रदान की.
आज छह महीने बीतने के बाद बच्चा सामान्य जीवन जी रहा है. इस अविश्वसनीय सफलता को राष्ट्रीय कैंसर सर्जरी सम्मेलन में 'बेस्ट पेपर अवार्ड' से सम्मानित किया गया है और अब विभाग इस केस को अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल्स में प्रकाशित करने की तैयारी कर रहा है, ताकि वैश्विक स्तर पर इस उपलब्धि को मान्यता मिल सके.
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने इस ऐतिहासिक सफलता पर पूरी मेडिकल टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे की मजबूती का प्रमाण है. मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. विवेक चौधरी और अस्पताल अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर ने भी इस सफलता को मील का पत्थर बताया है.
अम्बेडकर अस्पताल का यह विभाग अब छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों के मरीजों के लिए भी जटिल मीडियास्टाइनल कैंसर सर्जरी का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है, जहाँ 95 प्रतिशत से अधिक ऐसी जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की जा रही हैं.