इसरो में बदलाव पर सवाल, उठे पारदर्शिता के मुद्दे
नई दिल्ली । डेस्क: भारत की अंतरिक्ष एजेंसी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इस समय एक अनूठे विरोधाभास से गुजर रही है. एक तरफ जहां निजी उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने को लेकर इसरो के कर्मचारी संघों ने संगठन की मूल क्षमताओं और गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं, वहीं दूसरी तरफ हाल ही में इसरो के विश्वस्त रॉकेट पीएसएलवी की लगातार दो विफलताओं पर विस्तृत जानकारी सार्वजनिक न किए जाने को लेकर पारदर्शिता पर बहस छिड़ गई है.
पीएसएलवी की विफलता और गुणवत्ता पर सवाल
मई 2025 और जनवरी 2026 में पीएसएलवी रॉकेट के दो अभियानों में मिली असफलता ने अंतरिक्ष विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है. 58 सफल उड़ानों का शानदार रिकॉर्ड रखने वाले इस वर्कहॉर्स रॉकेट की विफलताओं ने गुणवत्ता नियंत्रण की मौजूदा प्रक्रिया पर चिंता बढ़ा दी है.
पूर्व इसरो वैज्ञानिकों का मानना है कि असफलता विश्लेषण समिति की रिपोर्ट को दबाने के बजाय सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि पुरानी गलतियों से सीखकर भविष्य की प्रणालियों को और अधिक सुरक्षित और बेहतर बनाया जा सके. विशेषज्ञों के अनुसार, नई पीढ़ियों के हाथों में कमान सौंपने के साथ सामग्री, प्रक्रियाओं और इंटरफेस में पहले जैसी कठोरता बनी हुई है या नहीं, इसकी समीक्षा जरूरी है.
निजीकरण की बहस और यूनियन का रुख
इसरो के कर्मचारी संघों ने अंतरिक्ष विभाग के अध्यक्ष वी. नारायणन को पत्र लिखकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं. संघ का कहना है कि अंतरिक्ष गतिविधियों को निजी उद्योगों को सौंपने से गुणवत्ता आश्वासन, सुरक्षा संस्कृति और जवाबदेही प्रभावित हो सकती है.
हालांकि, यूनियनों का स्पष्ट कहना है कि वे निजी क्षेत्र के प्रवेश या व्यावसायिकता के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी स्पष्ट और आधिकारिक नीति चाहते हैं जो निजी भागीदारी और इसरो की खुद की क्षमताओं को बनाए रखने के बीच स्पष्ट रेखा खींच सके.
इन-स्पेस की भूमिका और क्षेत्राधिकार का विवाद
यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब इन-स्पेस (IN-SPACe) के अध्यक्ष पवन गोयनका ने कहा कि भारतीय उद्योगों को अब परिपक्व प्रक्षेपण यान और उपग्रह बनाने चाहिए. इसके जवाब में इसरो के पूर्व अधिकारियों और संघों ने इन-स्पेस के क्षेत्राधिकार पर सवाल खड़े किए हैं. विश्लेषकों का मानना है कि नीति निर्माण का काम केवल अंतरिक्ष विभाग का है.
एक ही संस्था के पास संवर्धन (प्रमोशन) और विनियमन (रेगुलेशन) दोनों की जिम्मेदारी होने से हितों का टकराव हो सकता है, हालांकि इसे किसी द्वेष के बजाय नीतिगत भ्रम का परिणाम माना जा रहा है.
भविष्य की दिशा: अनुसंधान या उत्पादन?
इस विवाद के बीच पवन गोयनका ने स्पष्ट किया है कि इसरो का महत्व कभी कम नहीं होगा और वह देश के अंतरिक्ष क्षेत्र का आधार बना रहेगा. उनकी योजना के अनुसार, निजी उद्योग स्थापित तकनीक वाले रॉकेटों का निर्माण करेंगे, जबकि इसरो का ध्यान उन्नत अनुसंधान, वैज्ञानिक खोजों और 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन तथा 2040 तक मानव युक्त चंद्रमा मिशन जैसे रणनीतिक अभियानों पर रहेगा.
देखा जाए तो यह सोच नई नहीं है; दो दशक पहले भी पूर्व अध्यक्ष के. कस्तूरीरंगन ने ऐसा ही विजन प्रस्तुत किया था, लेकिन उस समय भारतीय उद्योग इसके लिए तैयार नहीं थे. अब 2020 की नीतियों के बाद देश में अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या में भारी उछाल आया है, जिससे इस विजन को लागू करने का रास्ता साफ हुआ है.