हसदेव में मत्स्य नीति के खिलाफ लड़ाई तेज करने का संकल्प
कोरबा | संवाददाता : मिनीमाता हसदेव बांगो बांध से विस्थापित 58 ग्रामों की 22 मछुआरा समितियों के संगठन विस्थापित आदिवासी हसदेव जलाशय संघर्ष समिति द्वारा ग्राम बुका में राज्य स्तरीय महासम्मेलन आयोजित किया गया. यह महासम्मेलन 1000 हेक्टेयर से अधिक जल क्षेत्र वाले जलाशयों को ठेका प्रणाली में देने वाली मत्स्य नीति के विरोध में आयोजित किया गया.
सभा को संबोधित करते हुए नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत ने वन अधिकार मान्यता कानून 2006 के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह कानून आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने के लिए लाया गया था.
उन्होंने कहा कि आदिवासियों के सामुदायिक अधिकारों में जल संसाधन भी शामिल हैं, लेकिन भाजपा सरकारों ने इन अधिकारों की अनदेखी की है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि विस्थापित आदिवासी मछुआरा समुदाय के अधिकारों के लिए वे पूरी मजबूती से खड़े हैं और मत्स्य नीति में बदलाव की लड़ाई को आगे बढ़ाएंगे.
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य में आदिवासियों के अधिकारों पर लगातार हमला हो रहा है. बस्तर में लौह अयस्क खनन और उत्तर छत्तीसगढ़ में कोयला खनन के नाम पर आदिवासी समुदायों के साथ अन्याय हो रहा है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस विस्थापित आदिवासी मछुआरा समुदायों की इस लड़ाई के साथ खड़ी है और उन्हें न्याय दिलाने के लिए संघर्ष जारी रखेगी.

पूर्व उप मुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2022 में पेसा कानून लागू कर ग्राम सभा को सशक्त बनाने का काम किया था, लेकिन वर्तमान सरकार इस कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफल रही है. उन्होंने कहा कि पेसा कानून ग्राम सभा को अपनी पारंपरिक सीमा में आने वाले जल, जंगल और जमीन पर निर्णय लेने का अधिकार देता है. ग्राम सभा की अनुमति के बिना जल क्षेत्रों को ठेके पर देना कानून का उल्लंघन है.
सांसद ज्योत्सना चरण दास महंत ने कहा कि विस्थापित आदिवासी मछुआरा समुदाय ने 10 महीने पहले भी उन्हें अपने आंदोलन में बुलाया था. उस समय उन्होंने आंदोलन में शामिल होकर राज्य शासन को पत्र लिखा था और अवगत कराया था कि वन अधिकार मान्यता कानून 2006 का उल्लंघन हो रहा है. उन्होंने कहा कि जल पर स्थानीय आदिवासी समुदायों का अधिकार है और मत्स्य नीति में तत्काल संशोधन किया जाना चाहिए. उन्होंने आश्वस्त किया कि वे आगे भी इस लड़ाई में समुदाय के साथ रहेंगी.
मछुआरा के समिति के अध्यक्ष फिरतु मिंजवार ने कहा कि मत्स्य नीति के नियमों का उल्लंघन करते हुए मत्स्य महासंघ ने बागों जलाशय का ठेका 10 सालों के लिए दे दिया, जिसका हम पिछले डेढ़ साल से विरोध कर रहे है हमने हमारा जल हमारा अधिकार का नारा के तहत अपने अधिकार के लिए लड़ना है.
मछुआरा समिति के संयोजक सदस्य ऋषि ने कहा कि विस्थापित आदिवासी मछुवारा समितियों का ठेकेदार शोषण कर रहे है, जिसके लिए हम मत्स्य नीति को बदलने की मांग को लेकर यह लड़ाई लड़ रहे है, जब तक वन अधिकार कानून के अनुरूप बागों बांध के विस्थापित आदिवासी मछुआरा समुदाय को उनके जलाशय पर अधिकार नहीं मिल जाते तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा.
मंच का संचालन करते हुए छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला ने कहा कि यह हसदेव के आदिवासी पिछले एक दशक से जल जंगल और जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे है. पूरे प्रदेश में वन अधिकार कानून और पेसा कानून का उल्लंघन कर आदिवासियों के अधिकारों को दरकिनार कर छत्तीसगढ़ के खनिज को लूटा जा रहा है .
महासम्मेलन में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि जलाशयों को बाहरी ठेकेदारों को सौंपने की नीति विस्थापित आदिवासी और पारंपरिक मछुआरा समुदायों के आजीविका अधिकारों, वन अधिकार कानून 2006 और पेसा कानून के खिलाफ है.
सम्मेलन में मांग की गई कि मत्स्य नीति में तत्काल संशोधन किया जाए, जलाशयों की ठेका प्रणाली समाप्त की जाए और वनभूमि पर स्थित छोटे-बड़े सभी जलाशयों के लिए मछली पालन का सामुदायिक अधिकार पत्र स्थानीय ग्राम सभाओं एवं मछुआरा समितियों को प्रदान किया जाए.
कार्यक्रम में पूर्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल, पूर्व मंत्री प्रेम साय टेकाम, विधायक जनक ध्रुव, आदित्येश्वर शरण सिंहदेव, कांग्रेस के पूर्व जिला अध्यक्ष कोरबा हरीश परसाई, पूर्व विधायक मोहित केरकेट्टा, कोरबा कांग्रेस के ग्रामीण जिला अध्यक्ष मनोज चौहान, सूरज महंत सहित 22 मछुआरा सहकारी समितियों के पदाधिकारी और 58 विस्थापित ग्रामों के हजारों आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन निवासी शामिल हुए.