भारत में पैक्ड फूड पदार्थों पर चेतावनी लेबल की तैयारी
नई दिल्ली । डेस्क: देश में बिकने वाले पैक्ड फूड पदार्थों पर 'रेड वॉर्निंग लेबल' लगाने के भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के प्रस्ताव ने पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दे दिया है. इस कदम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर भारत किस तरह सस्ते प्रोसेस्ड फूड पर निर्भर होता गया और क्यों बहुराष्ट्रीय कंपनियां अन्य देशों की तुलना में भारतीय बाजार में कम पोषण वाले उत्पाद बेच रही हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा FSSAI की चरणबद्ध योजना पर उठाए गए सवालों के बाद नियामक अब अतिरिक्त चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले खाद्य पदार्थों पर एक साथ कड़े लाल चेतावनी लेबल लागू करने पर विचार कर रहा है.
गुणवत्ता का दोहरा मानदंड और भारतीय बाजार की मजबूरी
भारत में बिकने वाले कई प्रसिद्ध ब्रांड्स के इंग्रेडिएंट्स विकसित देशों में बिकने वाले उन्हीं के उत्पादों से अलग हैं. उदाहरण के लिए, स्विट्जरलैंड की दिग्गज कंपनी नेस्ले भारत में मैगी नूडल्स बनाने के लिए पाम ऑयल का इस्तेमाल करती है, जबकि ब्रिटेन में बिकने वाले कई वेरिएंट्स में महंगे सनफ्लावर ऑयल का उपयोग किया जाता है.
इसी तरह, भारत में बिकने वाली किटकैट में ऑस्ट्रेलियाई वेरिएंट की तुलना में कोको की मात्रा कम होती है. जानकारों का मानना है कि कंपनियां लागत घटाने और कम आय वाले भारतीय उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर महंगे सामग्री के इस्तेमाल से बचती हैं. वहीं, कंपनियों का कहना है कि वे स्थानीय स्वाद, जलवायु और खाद्य संस्कृति के अनुसार अपने व्यंजनों में बदलाव करती हैं.
स्वास्थ्य संकट और बढ़ता पैक्ड फूड खाद्य कारोबार
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में बढ़ती मधुमेह की बीमारी का एक बड़ा कारण यह प्रोसेस्ड फूड है. देश में 10.1 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज की स्थिति में हैं. इसके बावजूद, भारत में पैक्ड फूड का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है. वर्ष 2025 में जो बाजार 129.18 अरब डॉलर का था, वह 2026 में बढ़कर 137.25 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और इसके 2034 तक 238.83 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है.
ब्रांड्स पर अटूट भरोसा और पुरानी रेसिपी का दबदबा
पश्चिमी खाद्य कंपनियां पिछले एक शतक से भारतीय बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं. 1912 में नेस्ले द्वारा बेचे गए कंडेंस्ड मिल्क से लेकर 1937 में यूनिलीवर के 'डालडा' तक, इन कंपनियों ने हमेशा कम लागत वाले विकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया. दशकों से चली आ रही इन रेसिपीज़ और स्वाद की आदतों के कारण आज उपभोक्ता इनके इतने आदी हो चुके हैं कि कंपनियां स्वाद में जरा सा भी बदलाव करने से कतराती हैं.
ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन का दावा है कि यदि प्रस्तावित नियम लागू होते हैं, तो भारत के लगभग 80 प्रतिशत पैक्ड फूड प्रोडक्ट्स पर चेतावनी का लेबल लगाना पड़ जाएगा.
जनता का बढ़ता आक्रोश और नियामक की सख्ती
चिले और मेक्सिको जैसे देशों में फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल लागू होने के बाद मीठे पेय पदार्थों की बिक्री में बड़ी गिरावट देखी गई थी. भारत में भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों, कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स का दबाव लगातार बढ़ रहा है. हाल ही में सामने आई रिपोर्टों के बाद कि उद्योग जगत के दबाव में चेतावनी लेबलों में ढील दी जा रही थी, आम जनता में भारी नाराजगी देखने को मिली.
इसी के बाद FSSAI ने कड़े कदम उठाने का संकेत दिया है, जिससे आने वाले समय में भारतीय खाद्य उद्योग के परिदृश्य में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.