पाकिस्तान: जल संकट से निपटने के लिए ग्लेशियरों का 'विवाह' कर रहे
स्कार्डू, पाकिस्तान । डेस्क: जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव से पाकिस्तान के हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे पानी की भारी कमी हो रही है. ऐसे में गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र के निवासी सदियों पुरानी पारंपरिक तकनीक 'ग्लेशियर ग्राफ्टिंग' (स्थानीय भाषा में 'ग्लेशियर मैरिज') का सहारा ले रहे हैं. इस विधि से वे कृत्रिम ग्लेशियर बनाकर कृषि, पशुपालन और घरेलू उपयोग के लिए पानी सुनिश्चित कर रहे हैं.
पाकिस्तान में अनुमानित 13,000 ग्लेशियर हैं और यह देश वैश्विक उत्सर्जन में 1% से भी कम योगदान देते हुए भी दुनिया के शीर्ष 10 सबसे जलवायु-संवेदनशील देशों में शामिल है. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, ग्लेशियरों के पिघलने का प्रभाव "बहुत महत्वपूर्ण" होने की संभावना है. 1950 के दशक से पाकिस्तान में औसत तापमान 1.3 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, जो वैश्विक औसत से दोगुना है.
ग्लेशियर ग्राफ्टिंग क्या है?
यह तकनीक सदियों पुरानी है, जिसमें ऊंचाई वाले सुरक्षित स्थानों पर बर्फ "रोपित" की जाती है ताकि नया कृत्रिम ग्लेशियर बने. बाल्टिस्तान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और शोधकर्ता जाकिर हुसैन जाकिर के अनुसार, इसकी शुरुआत 14वीं शताब्दी में सूफी संत मीर सैयद अली हमदानी द्वारा गियारी गांव में की गई थी.
शुरू में यह आक्रमणकारियों से रक्षा के लिए किया जाता था, लेकिन अब पानी की कमी दूर करने का प्रमुख माध्यम बन गया है.
कैसे किया जाता है ग्लेशियर ग्राफ्टिंग?
स्थानीय लोग "पुरुष" (काला रंग) और "स्त्री" (हल्का रंग) बर्फ अलग-अलग घाटियों से लाते हैं. लगभग 200 किलोग्राम प्रत्येक प्रकार की बर्फ को कोयला, घास, नमक और सात अलग-अलग नदियों के पानी से मिलाकर एक खाई में परत-दर-परत रखा जाता है. पुरुष बर्फ दाईं ओर और स्त्री बर्फ बाईं ओर. पूरी प्रक्रिया आध्यात्मिक अनुष्ठानों, कुरान की आयतों के जाप और सामूहिक श्रम से जुड़ी होती है. प्लास्टिक का उपयोग वर्जित, अनैतिक कार्यों से परहेज और केवल स्थानीय भोजन ही ग्रहण किया जाता है. बर्फ को जमीन पर नहीं छुआ जाता और इसे निरंतर गतिशील रखा जाता है.
साइट चयन महत्वपूर्ण है- उत्तर मुखी ढलान, कम धूप, हवा वाली जगह और बाढ़/हिमस्खलन से दूर. यदि मौसम अनुकूल रहा तो कुछ महीनों में बर्फ एक हो जाती है और 3 साल बाद यह स्थायी जल स्रोत बन सकती है. सफल होने पर 20 वर्षों में पानी उपलब्ध होने लगता है.
सांस्कृतिक महत्व और चुनौतियां
यह केवल तकनीकी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया है. ग्लेशियर को जीवित माना जाता है और गीत गाए जाते हैं, जैसे "मेरा प्यारा बेबी ग्लेशियर". स्वयंसेवक आंसू बहाते हुए प्रार्थना करते हैं. हालांकि, सफलता की गारंटी नहीं है, जलवायु परिवर्तन, कम बर्फबारी, युद्ध या सैन्य गतिविधियां (भारत-पाकिस्तान सीमा पर) इसे नाकाम कर सकती हैं.
यह पूर्ण समाधान नहीं, लेकिन स्वदेशी ज्ञान का शानदार उदाहरण है. युवा पीढ़ी शहरों की ओर पलायन कर रही है, जिससे यह परंपरा लुप्त होने के कगार पर है. फिर भी, यह जल संकट और अनियमित बर्फबारी से जूझते किसानों के लिए महत्वपूर्ण है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे पारंपरिक तरीके आधुनिक तकनीकों के साथ मिलकर जलवायु संकट से निपटने में मददगार साबित हो सकते हैं.