रात में दो बार सोते थे पूर्वज, कृत्रिम प्रकाश ने बदला सबकुछ
नई दिल्ली । डेस्क: मध्यरात्रि में अचानक नींद टूट जाना कई लोगों की आम समस्या है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शायद हमारी प्राचीन जड़ों का संकेत हो? इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के अनुसार, हजारों साल पहले मानव रात में एकसाथ 8 घंटे नहीं सोते थे. बल्कि दो चरणों में नींद लेते थे, पहली नींद सूर्यास्त के बाद कुछ घंटों की, फिर एक घंटे या इससे अधिक का अंतराल, और उसके बाद दूसरी नींद. यह पैटर्न यूरोप, एशिया और अफ्रीका में प्रचलित था.
इतिहासकारों ने प्राचीन ग्रंथों और दस्तावेजों से यह खोजा है कि मध्ययुगीन यूरोप में लोग इस 'बाइफेजिक स्लीप' को अपनाते थे. ग्रीक कवि होमर और रोमन कवि वर्जिल के लेखों में भी इसकी झलक मिलती है.
अंतराल के दौरान लोग क्या करते? ग्रामीण क्षेत्रों में किसान पशुओं को चारा देते, ठंडे देशों में आग को हवा देते. कई लोग बिस्तर पर ही प्रार्थना करते या पड़ोसी से गपशप करते. कुछ पढ़ाई-लिखाई या डायरी में समय बिताते, जबकि दंपति निजी पल साझा करते. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पैटर्न लंबी सर्द रातों को सहने में मदद करता था.
लेकिन 17वीं शताब्दी से यह आदत बदलने लगी. उस दौर में भारत में मुगल शासन था और इंग्लैंड में महारानी एलिजाबेथ प्रथम का निधन हुआ. किल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डैरन रोड्स के अनुसार, बदलाव का मुख्य कारण था कृत्रिम प्रकाश का आगमन.
पहले तेल के दीपक, फिर गैस लैंप और अंततः बिजली ने रात को दिन जैसा बना दिया. सूर्यास्त के बाद अंधेरा अब बाधा नहीं रहा. नतीजा? लोग देर रात तक जागने लगे और एकसाथ लंबी नींद लेने को मजबूर हुए.
औद्योगिक क्रांति ने इसे और गहरा किया. कारखानों की कठिन ड्यूटी के बाद श्रमिकों को एकसाथ आराम की जरूरत पड़ी, जिससे दो चरणों वाली नींद लुप्त हो गई.
आधुनिक वैज्ञानिक चेताते हैं कि उज्ज्वल रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन को प्रभावित करती है, जो नींद चक्र नियंत्रित करता है. इससे अनिद्रा जैसी समस्याएं बढ़ी हैं.
क्या हम पुरानी आदत अपनाएं? विशेषज्ञ कहते हैं, छोटे-छोटे ब्रेक से नींद की गुणवत्ता सुधर सकती है. लेकिन आधुनिक जीवनशैली में यह चुनौतीपूर्ण है. फिर भी, इतिहास हमें सिखाता है-नींद सिर्फ आराम नहीं, बल्कि प्राकृतिक लय है. (AI Generated Symbolic Photo)