तमिलनाडु में गोहत्या पर तुरंत रोक का आदेश
चेन्नई । डेस्क: मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को पूरे राज्य में गोहत्या पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाने का कड़ा निर्देश दिया है. न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार और दूध उत्पादन के हित में 30 अगस्त, 1976 को जारी किए गए सरकारी आदेश (जी.ओ.) को पूरी तरह से लागू किया जाए.
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मणन की ग्रीष्मकालीन अवकाश पीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश सुनाया. अदालत ने मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को स्पष्ट आदेश दिया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि तमिलनाडु में कहीं भी किसी भी गाय या बछड़े का वध न किया जाए.
अदालत ने साफ किया कि यह नियम बकरीद के अवसर पर और उसके बाद के सभी दिनों के लिए समान रूप से लागू रहेगा.
दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने अधीनस्थों को इस आदेश का कड़ाई से पालन कराने के लिए उचित दिशा-निर्देश जारी करें. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को तय की है, जिसमें सरकार को अनुपालन रिपोर्ट सौंपनी होगी.
इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय नियम, 2023 के तहत बकरे और भेड़ जैसे अन्य जानवरों का वध भी किसी भी खुले या अनधिकृत स्थान पर नहीं किया जा सकता. ऐसे किसी भी पशु की बलि या वध केवल वैध लाइसेंस प्राप्त और सरकार द्वारा निर्धारित बूचड़खानों में ही किया जाना चाहिए.
यह आदेश 'इन्दु मक्कल कत्छी' के युवा विंग के सचिव के. सूर्य उर्फ के. सूर्य प्रशांत द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर आया है. याचिकाकर्ता ने कोयंबटूर में बकरीद के दौरान गायों के वध के लिए लगाए गए अस्थायी शेडों का मुद्दा उठाया था.
फैसले की व्याख्या करते हुए न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48 स्पष्ट रूप से राज्य को गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू व भार ढोने वाले मवेशियों के वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने का निर्देश देता है.
उन्होंने संविधान सभा के बहसों का हवाला देते हुए कहा कि गाय एक पूजनीय पशु है जो भगवान कृष्ण के समय से हमारी सभ्यता से जुड़ी हुई है. महात्मा गांधी के लिए भी गो-संरक्षण एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा था.
न्यायाधीश ने यह भी उल्लेख किया कि इतिहास में कई मुस्लिम राजाओं ने भी अपने शासनकाल के दौरान गोहत्या पर प्रतिबंध लगाया था. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि इस्लाम को मानने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए बकरीद पर गाय की ही बलि देना कोई अनिवार्य धार्मिक कृत्य नहीं है.
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि कार्यपालिका की शक्ति विधायिका के समवर्ती होती है, इसलिए 1976 का सरकारी आदेश कानूनन पूरी तरह वैध है और इसे सख्ती से लागू किया जाना अनिवार्य है.