कोठागुडेम से किरंदुल तक नई रेल लाइन परियोजना का विरोध
छत्तीसगढ़ में कोठागुडेम से किरंदुल तक नई रेल लाइन परियोजना का विरोध
दंतेवाड़ा | संवाददाताः छत्तीसगढ़ में बस्तर के दंतेवाड़ा में कोठागुडेम से किरंदुल तक नई रेल लाइन परियोजना का काम तेज़ हो गया है. 160.33 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन के फाइनल लोकेशन सर्वे को केंद्र सरकार की मंजूरी मिल चुकी है और सर्वे का काम अंतिम चरण में है.
आदिवासी इस रेल लाइन परियोजना के ख़िलाफ़ खड़े हो गए हैं. उनका आरोप है कि यह रेल परियोजना असल में बस्तर के वन और खनिज संसाधनों के दोहन के लिए बनाई गई है और बस्तर पर एक और संकट आने वाला है.
बस्तर में प्रस्तावित कोठागुडेम से किरंदुल रेल मार्ग का लगभग 138 किलोमीटर हिस्सा सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जैसे नक्सल प्रभावित जिलों से होकर गुज़रेगा.
आज़ादी के बाद से यह इलाका रेल संपर्क से वंचित रहा है. सरकार का दावा है कि इस परियोजना से आवागमन आसान होगा और सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा.
रेलवे विस्तार के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन
लेकिन दंतेवाड़ा ज़िले में इस परियोजना का विरोध शुरू हो गया है. एक दर्जन से अधिक पंचायतों के प्रतिनिधि बस्तारिया राज मोर्चा के संस्थापक मनीष कुंजाम के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट पहुँचे और कलेक्टर कुणाल दुदावत को ज्ञापन सौंपा.
सीजी खबर से बात करते हुए मनीष कुंजाम कहते हैं कि रेलवे विस्तार के नाम पर सरकार केवल प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना चाहती है. उन्होंने आरोप लगाया कि रेलवे लाइन बिछाने के लिए पहाड़ काटे जाएंगे, हजारों पेड़ उखाड़े जाएंगे और मालवाहक ट्रेनें चलाई जाएंगी.
इससे न तो स्थानीय आदिवासी समाज को रोज़गार मिलेगा और न ही उनके जीवन स्तर में सुधार होगा. बल्कि यह परियोजना उनके धार्मिक स्थलों, जंगलों और नदियों को नुकसान पहुँचाएगी.
बताया जा रहा है कि लगभग 13 पंचायतें इस परियोजना से प्रभावित होंगी. यहाँ के ग्रामीण अपनी आजीविका के लिए जंगलों और पहाड़ों पर निर्भर हैं.
उनका कहना है कि बिना सहमति और चर्चा के कोई भी सर्वे या काम स्वीकार्य नहीं होगा.
प्रभावित क्षेत्र पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत
ग्रामीणों और जन प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रभावित क्षेत्र पाँचवीं अनुसूची में आता है और यहाँ पेसा कानून लागू है. इस कानून के अनुसार किसी भी विकास परियोजना से पहले ग्रामसभा की अनुमति लेना अनिवार्य है, लेकिन रेलवे सर्वे, पुलिस बल के साथ किया जा रहा है.
जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि अधिकारी सिर्फ़ औपचारिकता निभाते हैं और ग्रामीणों की आवाज़ को अनसुना कर लौट जाते हैं. इससे आदिवासियों में असंतोष और गुस्सा बढ़ रहा है.
होगा व्यापक जनआंदोलन
ज्ञापन सौंपने वाले प्रतिनिधियों ने साफ कहा कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, बल्कि उस नीति का विरोध कर रहे हैं जिसमें आदिवासियों की राय को नज़रअंदाज़ कर ज़बरन परियोजनाएँ थोप दी जाती हैं.
उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने ग्रामीणों की बात नहीं मानी तो व्यापक जनआंदोलन शुरू किया जाएगा.
कथित विकास और विरोध का स्वर
बस्तर में प्रस्तावित कोठागुडेम-किरंदुल रेल परियोजना को सरकार विकास की नई राह बता रही है. लेकिन जिस ज़मीन से यह गुज़रनी है, वहीं के लोग इसे अपने जंगल, संस्कृति और अस्तित्व पर सीधा हमला मान रहे हैं.
आज़ादी के बाद से रेल संपर्क से वंचित यह इलाका अब एक नए मोड़ पर खड़ा है. कथित विकास की रेलगाड़ी यहाँ से गुज़रेगी या विरोध की आवाज़ें उसे रोक देंगी, यह आने वाला वक्त तय करेगा.