भारत में बढ़ रही है महिलाओं पर ऑनलाइन हिंसा
बढ़ रही है महिलाओं पर ऑनलाइन हिंसा
आयुषी शर्मा | रायपुर : महिलाओं के ख़िलाफ़ अमर्यादित और घटिया टिप्पणी करने वाले गालीबाज गिरोह का डंका दुनिया भर में बज रहा है. यूएन विमन की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि भारत आज खुद को दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल लोकतंत्र बताता है, लेकिन महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन हिंसा की जमीनी हकीकत इस दावे को खोखला साबित करती है.
यूएन विमन की ताज़ा रिपोर्ट साफ दिखाती है कि एआई के युग में ऑनलाइन हिंसा अब कीबोर्ड का शौक़िया शोर नहीं, यह महिलाओं की आवाज़, प्रतिष्ठा और सार्वजनिक उपस्थिति को कुचलने का संगठित हथियार बन चुकी है. और भारत में यह हिंसा सिर्फ ट्रोलिंग नहीं, बल्कि संस्कारी गालीबाज गिरोहों का सुनियोजित अभियान बन गई है.
ये गिरोह जो संस्कृति और सभ्यता की दुहाई देते हुए महिलाओं पर सबसे घटिया, लैक्चर भरी और यौनिक हिंसा से भरी गालियाँ बरसाता है. डिजिटल भीड़ का यह संरक्षित झुंड किसी भी महिला को, चाहे वह पत्रकार हो, एक्टिविस्ट हो या आम नागरिक, एक ही संदेश देता है- अगर बोलोगी, सवाल करोगी, या सच लिखोगी तो तुम्हें बर्बाद कर दिया जाएगा.
वैश्विक आंकड़े तो खैर भयावह हैं ही, लेकिन भारत में सोशल मीडिया की विस्फोटक पैठ, राजनीतिक ध्रुवीकरण और संगठित ऑनलाइन भीड़ ने इस हिंसा को एक ऐसे हथियार में बदल दिया है, जिसका उद्देश्य स्पष्ट है, महिलाओं को डराकर, थकाकर और अपमानित करके लोकतांत्रिक भागीदारी से बाहर धकेल देना.
आज की तारीख में ऑनलाइन हिंसा अब महिला आवाज़ों को डराने का औज़ार नहीं, बल्कि उन्हें चुप कराने का संगठित हथियार बन चुकी है, और भारत इस वास्तविकता से अप्रभावित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में खड़ा है.
आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर की 70% महिलाएँ, मानवाधिकार रक्षक, एक्टिविस्ट, पत्रकार, अपने काम के दौरान ऑनलाइन हिंसा झेल चुकी हैं . भारत में, जहाँ सोशल मीडिया पैठ तेजी से बढ़ी है, यह आँकड़ा कहीं ज़्यादा खतरनाक रूप ले चुका है, चाहे वह महिला पत्रकारों पर हमले हों, दलित-बहुजन या मुस्लिम महिलाओं की ऑनलाइन बिडिंग जैसी घिनौनी हरकतें हों, या फिर राजनीतिक काम करने वाली महिलाओं पर समन्वित डिजिटल हमले. यह हिंसा किसी गलती का नतीजा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे में महिलाओं की हिस्सेदारी को डराकर, थकाकर, और तोड़कर खत्म करने का सुनियोजित प्रयास है.
अलग-अलग तरह के आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि 41% महिलाएँ ऑनलाइन हमले के बाद ऑफलाइन हिंसा का सामना करती हैं. पीछा किया जाना, धमकियाँ, शारीरिक हमला, स्वाटिंग जैसे गंभीर अपराध से उनका सामना होता है. भारत में यह आंकड़ा और भी भयावह हो जाता है क्योंकि यहाँ कानून का दायरा विशाल है, लेकिन अमल बेहद कमजोर. जब कोई महिला पत्रकार ट्रोल आर्मी द्वारा डराई जाती है, उसके घर का पता सार्वजनिक किया जाता है, या उसके परिवार को धमकियाँ दी जाती हैं, तो यह ऑनलाइन उत्पीड़न मात्र नहीं, बल्कि एक प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक सज़ा है, उसके बोलने के अधिकार पर हमला.
सबसे डरावनी बात यह है कि 2020 से 2025 के बीच दुनिया में महिलाओं पत्रकारों के खिलाफ ऑनलाइन-से-ऑफलाइन हिंसा के मामले दोगुने हुए हैं, 20% से बढ़कर 42% तक. भारत इस ट्रेंड का अपवाद नहीं, बल्कि इसका प्रतीक है. यहाँ महिला पत्रकारों पर डिजिटल नफ़रत का तूफ़ान राजनीतिक लाइनों पर, धार्मिक पहचान पर, जातीय पृष्ठभूमि पर और यहां तक कि उनके काम के विषय पर निर्भर करता है. जो भी महिला सत्ता से असहमत स्वर उठाती है, उसे देशद्रोही, एजेंट, वेश्या, टीका-बिंदी गैंग जैसे शब्दों से नवाज़ा जाता है. ऑनलाइन हिंसा का यह सिस्टम एक बात दिखाता है , महिलाओं से नफरत कोई इमोशनल रिएक्शन नहीं, बल्कि संगठित, रणनीतिक और लक्षित हमला है.
AI ने इसकी आग में घी डाल दिया है. रिपोर्ट के अनुसार 24% महिलाएँ AI-आधारित हिंसा का शिकार हुई हैं, डीपफेक, AI जनरेटेड बदनाम करने वाली सामग्री, एल्गोरिदमिक तरीके से फैलाई गई नफ़रत. भारत में यह सबसे तेज़ी से बढ़ रहा खतरा है. डीपफेक पोर्नोग्राफी अब किसी महिला को चुप कराने का सबसे आसान, सस्ता और घातक तरीका बन गया है. पहले इसे सेलिब्रिटीज़ के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता था, अब कोई भी महिला, कॉलेज छात्रा, कार्यकर्ता, पत्रकार, इसका शिकार हो सकती है. यहाँ की समस्या सिर्फ तकनीक की नहीं है; यह उस समाज की सोच का प्रतिबिंब है, जो महिला को दंडित करने का सबसे आसान रास्ता खोजता है, उसकी प्रतिष्ठा को नष्ट कर दो, उसकी आवाज़ अपने आप टूट जाएगी.
एआई केवल हथियार नहीं, एम्प्लीफायर भी है. एल्गोरिदम ऐसे कंटेंट को बढ़ाते हैं जो गुस्सा, नफ़रत और सनसनी पैदा करे. भारत जैसे देश में, जहाँ सामाजिक ध्रुवीकरण पहले से ही गहरा है, ये एल्गोरिदम स्त्री-विरोधी हिंसा को सामान्य बना देते हैं. प्लेटफ़ॉर्म मुनाफ़े की भूख में ऐसी सामग्री को ऊपर धकेलते हैं, जिसके कारण महिलाएँ सार्वजनिक जीवन से गायब हो रही हैं. यही रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यह सिर्फ अभिव्यक्ति पर हमला नहीं, लोकतंत्र पर हमला है.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में, यह समस्या और गहरी है क्योंकि ऑनलाइन हिंसा का मुकाबला करने के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा बेहद कमजोर है. महिलाएँ जब शिकायत दर्ज करवाती हैं, तो उन्हें ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है-सोशल मीडिया पर क्यों थीं?, फोटो क्यों अपलोड की?, बहस में क्यों पड़ीं?. यह जिम्मेदारी अपराधी से हटाकर पीड़िता पर डालने का पुराना पितृसत्तात्मक तरीका है. और यही कारण है कि लाखों भारतीय महिलाएँ शिकायत भी नहीं करतीं, क्योंकि शिकायत करना ही अपने खिलाफ दूसरी लड़ाई शुरू कर देने जैसा है.
ऑनलाइन हिंसा महिलाओं की अभिव्यक्ति को ठंडा कर देती है, जिसे चिलिंग इफेक्ट कहा गया है . भारत में यह चिलिंग इफेक्ट इतना गंभीर हो चुका है कि अनेक महिला एक्टिविस्ट अपने सोशल मीडिया अकाउंट लॉक कर देती हैं, कई पत्रकार सोशल मीडिया पर लिखना बंद कर देते हैं, और कई युवा महिलाएँ तकनीकी क्षेत्र, सार्वजनिक जीवन या राजनीतिक प्रक्रिया से दूर हो जाती हैं. यह सिर्फ व्यक्तिगत नुकसान नहीं, यह लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने वाला हमला है. जब आधी आबादी डर के कारण चुप हो जाए, तो लोकतंत्र छलावा बन जाता है.
भारत को अब यह मान लेना होगा कि डिजिटल सुरक्षा सिर्फ साइबर सेल का मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकता है. महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन हिंसा को ट्रोलिंग, बकवास, ऑनलाइन मज़ाक कहकर खारिज करने का दौर खत्म होना चाहिए. यह हिंसा उतनी ही वास्तविक है जितनी घर में होने वाली हिंसा, सड़क पर होने वाली हिंसा, या कार्यस्थल पर होने वाला उत्पीड़न. एआई के युग में यह और भी खतरनाक हो चुकी है, तेज़, व्यापक, अनाम, और अक्सर बिना किसी कानूनी परिणाम के.
भारत को एक आक्रामक डिजिटल नीति की ज़रूरत है, जो प्लेटफ़ॉर्मों को जवाबदेही में बांध सके, डीपफेक और गैर-सहमति वाली सामग्री पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित कर सके, और महिलाओं की डिजिटल सुरक्षा को अधिकार नहीं बल्कि जरूरत के रूप में स्वीकार करे.
लेकिन सबसे बड़ी लड़ाई सामाजिक है, एक ऐसी लड़ाई जिसे भारतीय समाज को स्वीकारना ही नहीं, बल्कि नेतृत्व करना होगा. क्योंकि सच यह है कि अगर भारत अपनी महिलाओं की डिजिटल आवाज़ की रक्षा नहीं कर सकता, तो वह अपने लोकतंत्र की रक्षा बिल्कुल नहीं कर सकता. एआई के युग में, महिलाओं की सुरक्षा पर हमला सीधे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला है.