रिश्वत की मांग के बिना रिश्वतखोरी का अपराध साबित नहीं: HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने रिश्वतखोरी के 10 साल से अधिक पुराने एक मामले में शिक्षा विभाग के अधिकारी मुरली प्रसाद चौधरी को बरी कर दिया है. बिलासपुर स्थित हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के न्यायाधीश जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने निचली अदालत के वर्ष 2017 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सूरजपुर जिले के जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कार्यालय में पदस्थ लेखापाल मुरली प्रसाद चौधरी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई थी.
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि रिश्वत की मांग ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध का मूल आधार (ग्रेवामेन) है. जब तक अभियोजन पक्ष बिना किसी संदेह के रिश्वत की मांग को साबित नहीं कर देता, तब तक आरोपी से केवल दागी नोटों की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं हो सकती.
यह मामला वर्ष 2014 का है, जब मां सरस्वती शिक्षा समिति के अध्यक्ष और प्रबंधक मोहित राम रजवाड़े ने एक स्कूल की मान्यता के सिलसिले में डीईओ कार्यालय से संपर्क किया था. एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) का आरोप था कि लेखापाल ने मान्यता के बदले रिश्वत मांगी थी और 30 जून 2014 को एक जाल बिछाकर उनके पास से 8,000 रुपये के दागी नोट बरामद किए थे.
इसी आधार पर विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था.
हालांकि, हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान लेखापाल के वकील ने तर्क दिया कि अवैध लाभ की मांग और स्वीकृति दोनों का सबूत होना कानूनन अनिवार्य है. कोर्ट ने पाया कि इस मामले में शिकायतकर्ता मोहित राम रजवाड़े अदालत में अपने बयान से पूरी तरह पलट गया (होस्टाइल हो गया).
शिकायतकर्ता ने स्पष्ट रूप से गवाही दी कि आरोपी ने कभी उससे कोई रिश्वत नहीं मांगी थी. उसने बताया कि स्कूल की मान्यता के लिए फिक्स डिपॉजिट अकाउंट खुलवाने के नाम पर किसी अन्य व्यक्ति को पैसे दिए गए थे और पुलिस ने विश्राम गृह में बिना पढ़कर ही उससे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए थे.
अदालत ने अवलोकन किया कि मामले का मुख्य गवाह ही अपने बयान से मुकर चुका है और अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग का सबसे आवश्यक घटक साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने निचली अदालत के सजा के फैसले को निरस्त करते हुए अधिकारी को सभी आरोपों से बरी कर दिया.