NSSO सर्वे: सरकारी स्कूलों में भी चुकानी पड़ रही है फीस !
नई दिल्ली । डेस्क: हाल ही में जारी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के 'व्यापक मॉड्यूल सर्वेक्षण: शिक्षा (CMS: E) 2025' के चौंकाने वाले आंकड़ों ने देश में मुफ्त शिक्षा के दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है. सर्वे के मुताबिक, सरकारी स्कूलों में नामांकित लगभग 27 प्रतिशत छात्र प्रवेश, ट्यूशन, परीक्षा और विकास शुल्क जैसे विभिन्न मदों में भुगतान कर रहे हैं.
यह स्थिति शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के बिल्कुल उलट नजर आती है, जो 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है.
राज्यसभा में YSRCP सांसद एस. निरंजन रेड्डी द्वारा पूछे गए एक लिखित सवाल के जवाब में यह मुद्दा गरमाया. सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि सरकारी स्कूलों के 26.7 प्रतिशत छात्रों ने 'कोर्स फीस' देने की बात स्वीकारी है.
शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है, जहां 34.7 प्रतिशत छात्र फीस दे रहे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या 25.3 प्रतिशत है.
खर्च के मामले में भी बड़ा अंतर देखा गया है; ग्रामीण भारत के सरकारी स्कूलों में प्रति छात्र औसत वार्षिक खर्च ₹2,639 है, जो शहरी क्षेत्रों में बढ़कर ₹4,128 हो जाता है.
इस गंभीर मुद्दे पर केंद्र सरकार का रुख रक्षात्मक दिखाई दिया. शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने अपने लिखित जवाब में स्पष्ट किया कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है और सरकारी स्कूलों का सीधा प्रबंधन राज्य सरकारों के हाथों में होता है.
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के स्वामित्व वाले स्कूलों को छोड़कर अन्य सभी विद्यालयों के प्रबंधन और शुल्क संरचना से जुड़े नियम राज्यों द्वारा ही तय किए जाते हैं. हालांकि, शिक्षा जगत के कुछ जानकारों का मानना है कि सर्वे में विभिन्न प्रकार के मामूली शुल्कों को 'कोर्स फीस' के साथ जोड़ दिया गया होगा, क्योंकि सरकारी स्कूल आमतौर पर ट्यूशन फीस नहीं लेते हैं !