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अब नाबालिग भी ले सकेंगे अग्रिम जमानत- कलकत्ता HC

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14 नव. 2025, 05:41 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

कलकत्ता हाईकोर्ट
कलकत्ता हाईकोर्ट

कोलकाता । डेस्क: कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए नाबालिगों के लिए अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) का रास्ता खोल दिया है. कोर्ट ने कहा कि वयस्क अपराध के आरोपी या अभियुक्त होने पर अग्रिम जमानत ले सकते थे, लेकिन नाबालिगों को यह सुविधा नहीं थी. भारत के किसी भी हाई कोर्ट ने पहले ऐसा फैसला नहीं दिया था.


न्यायमूर्ति जय सेनगुप्ता, न्यायमूर्ति तीर्थंकर घोष और न्यायमूर्ति बिभास पटनायक की वृहद पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. इस निर्णय से नाबालिगों को गिरफ्तारी से पहले सुरक्षा मिल सकेगी.

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यह मामला रघुनाथगंज थाने में दर्ज एक आपराधिक मामले से जुड़ा है, जिसमें चार नाबालिगों पर हत्या (धारा 302), हत्या का प्रयास (धारा 307) जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई थीं. गिरफ्तारी के डर से, उन्होंने अग्रिम जमानत की मांग की थी.


सवाल उठा कि क्या दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 438 (अग्रिम जमानत) बच्चों पर लागू होती है. याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि इस कानून में 'कोई भी व्यक्ति' अग्रिम जमानत मांग सकता है, और कहीं भी नाबालिगों को इससे प्रतिबंधित नहीं किया गया है.


कलकत्ता हाई कोर्ट की वृहद पीठ ने निम्नलिखित मुख्य बातें कही:


'कोई भी व्यक्ति' में बच्चे भी शामिल: कोर्ट ने कहा कि अपराध संहिता में इस्तेमाल किए गए शब्द 'कोई भी व्यक्ति' (जो कोई भी) में बच्चे भी शामिल हैं, क्योंकि कानून ने यहां वयस्क और नाबालिग में कोई भेद नहीं किया है.


जेजे एक्ट गिरफ्तारी से पहले की बात नहीं करता: जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 (JJ Act) केवल हिरासत के बाद बच्चों को कैसे रखा जाएगा, कहां भेजा जाएगा और कैसे जमानत दी जाएगी, इसकी बात करता है. यह गिरफ्तारी/हिरासत से पहले की स्थिति पर चुप्पी साधता है.


हिरासत भी स्वतंत्रता का हनन: हाई कोर्ट ने माना कि नाबालिगों के मामले में 'गिरफ्तारी' न कहकर 'हिरासत' कहा जाता है, लेकिन दोनों ही मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता है. इसलिए, CrPC की धारा 438 का तर्क यहां भी लागू होता है.


व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि: संविधान का अनुच्छेद 21 (स्वतंत्रता का अधिकार) सभी के लिए है, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं. चूंकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सबसे मूल्यवान है, इसलिए यदि वयस्क अग्रिम जमानत मांग सकता है, तो बच्चों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है.


पीठ के तीन न्यायाधीशों में से न्यायमूर्ति बिभास पटनायक ने अपना अलग मत रखा. उनका मानना था कि चूंकि बच्चों को गिरफ्तार नहीं, बल्कि केवल हिरासत में लिया जाता है, इसलिए CrPC की धारा 438 (जो गिरफ्तारी की आशंका पर अग्रिम जमानत देती है) बच्चों पर लागू नहीं होती. उन्होंने आशंका जताई कि अग्रिम जमानत देने से जेजे एक्ट का उद्देश्य बाधित हो सकता है और बच्चे गलत लोगों के संपर्क में आ सकते हैं.


हालांकि, अंतिम निर्णय के रूप में, कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि नाबालिग भी अग्रिम जमानत पाने के हकदार हैं.


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देश भर के किशोर न्याय मामलों (Juvenile cases) पर एक बड़ा प्रभाव डालेगा और नाबालिगों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक नई कानूनी मिसाल कायम करेगा.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP