'नो वर्क नो पे' का नियम हर जगह लागू नहीं- HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया है कि 'नो वर्क, नो पे' (काम नहीं तो वेतन नहीं) का सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से हर स्थिति में लागू नहीं किया जा सकता है. न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने एक सेवानिवृत्त अधिकारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी को विभाग की स्पष्ट गलती, लापरवाही या अवैध कार्रवाई के कारण पदोन्नति से वंचित रखा गया है, तो उसे उस अवधि के वित्तीय लाभों से रोकना न्यायसंगत नहीं है.
मामला अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के एक सहायक आयुक्त का था, जिन्हें उनकी पात्रता और वरिष्ठता के बावजूद पांच वर्षों तक डिप्टी कमिश्नर के पद पर पदोन्नति नहीं दी गई थी, जबकि उनके कनिष्ठ सहयोगियों को प्रमोट कर दिया गया था.
कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कर्मचारी उच्च पद की जिम्मेदारियां निभाने के लिए पूरी तरह तैयार और पात्र था, लेकिन नियोक्ता की चूकों के कारण उसे इस अवसर से दूर रखा गया, तो इसके लिए विभाग का दोष माना जाएगा.
अदालत ने राज्य सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि काल्पनिक (नोशनल) पदोन्नति के मामले में बकाया वेतन नहीं दिया जाता है. अंततः, न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देशित किया है कि याचिकाकर्ता को 13 जुलाई 2011 से उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि 31 दिसंबर 2016 के बीच के वेतन अंतर का 50 प्रतिशत एरियर चार महीने के भीतर भुगतान किया जाए.
कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया गया, तो पूरी राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा.