चुनावी फायदे के लिए लेबनान में नेतन्याहू का 'नरसंहार'
यरूशलेम । डेस्क: मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदों पर उस समय पानी फिर गया जब अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम के महज कुछ ही घंटों बाद इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के आदेश पर लेबनान में भीषण रक्तपात मचाया गया. बुधवार को इजरायली वायुसेना ने लेबनान के रिहायशी इलाकों, बेरूत और बेका घाटी पर महज 10 मिनट के भीतर 100 से अधिक हमले किए, जिसमें 254 निर्दोष लोग मारे गए.
राजनीतिक विश्लेषकों और इजरायली विपक्ष का स्पष्ट मानना है कि यह कोई सैन्य मजबूरी नहीं, बल्कि अक्टूबर में होने वाले आम चुनावों से पहले अपनी गिरती लोकप्रियता को बचाने के लिए नेतन्याहू द्वारा रचित एक सुनियोजित 'नरसंहार' है.
इजरायल के भीतर नेतन्याहू इस समय अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं, जहां सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता लगातार गिर रही है और जनता में यह संदेश जा रहा है कि वे ईरान के साथ इस 'अस्तित्व की लड़ाई' में अपने किसी भी घोषित लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहे हैं.
इस सैन्य कार्रवाई के पीछे की असल मंशा को समझने के लिए इजरायल की आंतरिक राजनीति पर गौर करना आवश्यक है. युद्धविराम समझौते में इजरायल की सक्रिय भागीदारी न होना और ईरान की 10-सूत्रीय शांति योजना का प्रभावी होना नेतन्याहू के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका साबित हुआ है.
इस समझौते के तहत ईरान न केवल अपना परमाणु भंडार बरकरार रखेगा, बल्कि उसे प्रतिबंधों में ढील और वित्तीय लाभ भी मिलने की उम्मीद है. नेतन्याहू के कट्टर समर्थक इसे हार के रूप में देख रहे हैं, जिससे उनकी 'मिस्टर सिक्योरिटी' वाली छवि पूरी तरह ध्वस्त हो गई है.
विपक्षी नेता यायर लैपिड ने तीखी टिप्पणी करते हुए यहाँ तक कह दिया कि नेतन्याहू ने इजरायल को एक 'कठपुतली राज्य' बना दिया है जो फोन पर निर्देश प्राप्त करता है.
वहीं, 'डेमोक्रेट्स' नेता यायर गोलान ने इसे इजरायल की सबसे बड़ी रणनीतिक विफलता करार दिया है. ऐसे में अपनी सत्ता बचाने के लिए नेतन्याहू को एक ऐसी 'जीत' की दरकार थी जिसे वे जनता के सामने पेश कर सकें, और इसी का परिणाम लेबनान में हुआ यह भीषण हमला है.
हदाश पार्टी की सांसद आयडा तौमा सुलेमान ने अल जजीरा से बात करते हुए इस कड़वे सच को उजागर किया है कि नेतन्याहू युद्धविराम को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे अपनी राजनीतिक नैया पार लगा सकें. उनके अनुसार, अक्टूबर के चुनाव सिर पर हैं और नेतन्याहू के पास दिखाने के लिए कोई उपलब्धि नहीं है, इसलिए उन्होंने लेबनान के व्यस्त इलाकों में नरसंहार का रास्ता चुना.
पूर्व इजरायली सलाहकार डैनियल लेवी ने भी इस हमले को 'उकसावे की कार्रवाई' बताते हुए कहा कि यह व्यापक युद्ध को लंबा खींचने और किसी भी शांति संभावना को खत्म करने की एक पारदर्शी कोशिश है.
हालांकि इजरायल के पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार चार्ल्स फ्रीलिच इसे हिजबुल्लाह के खिलाफ एक अवसर बता रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निंदा कुछ और ही बयां करती है.
ब्रिटेन, फ्रांस, पाकिस्तान और संयुक्त राष्ट्र ने इस हमले को युद्धविराम की भावना के खिलाफ बताया है. इस नरसंहार ने न केवल हजारों परिवारों को तबाह किया है, बल्कि ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी फिर से शुरू करने का मौका दे दिया है, जिससे पूरी दुनिया एक बार फिर आर्थिक संकट और महायुद्ध के मुहाने पर खड़ी हो गई है.
स्पष्ट है कि सत्ता की ललक और चुनावी गणित को साधने के लिए नेतन्याहू ने शांति की बलि चढ़ा दी है.