नेपाल: अदालती कामकाज में AI को मंजूरी, फैसला लिखने पर रोक
काठमांडू । डेस्क: नेपाल में न्यायिक प्रणाली को आधुनिक और अधिक कुशल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है. नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण बैठक (फुल-कोर्ट मीटिंग) ने औपचारिक रूप से 'न्यायपालिका सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी नीति 2026' को मंजूरी दे दी है. इस नई नीति के तहत अब अदालत के कामकाज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल का रास्ता साफ हो गया है.
इसके जरिए कानूनी अनुसंधान (लीगल रिसर्च), अदालती दस्तावेजों के प्रबंधन और प्रशासनिक कार्यों में एआई की मदद ली जाएगी. हालांकि, इस नीति में एक बेहद कड़ा और स्पष्ट नियम भी जोड़ा गया है कि न्यायिक विवेक या मानवीय कानूनी समझ वाले फैसलों और फैसलों को लिखने में एआई का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा.
अदालती व्यवस्था में बदलाव लाने वाली इस नीति का प्राथमिक उद्देश्य प्रौद्योगिकी के अधिकतम उपयोग से न्याय वितरण को त्वरित और प्रभावी बनाना है. नई व्यवस्था के तहत एआई-आधारित प्रणालियों को शुरुआती चरणों में केवल गैर-निर्णयात्मक दस्तावेज तैयार करने, पुराने फैसलों की केस स्टडी करने और अकादमिक शोध जैसे कार्यों में लगाया जाएगा.
इसके साथ ही न्यायपालिका अपने पुराने केस मैनेजमेंट डेटाबेस में भी बड़ा बदलाव करने जा रही है, जिससे सभी अदालती रिकॉर्ड और कानूनी दस्तावेजों को मशीन-पठनीय प्रारूपों (मशीन-रीडेबल फॉर्मेट) में बदला जा सके. इससे एआई सिस्टम को सर्वोच्च न्यायालय सहित देश की अन्य अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों और आदेशों का तेजी से विश्लेषण करने और उन्हें खोजने में आसानी होगी.
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य रजिस्ट्रार बिमल पौडेल ने इस नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि एआई को केवल एक सहायक उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि मानवीय न्यायिक निर्णय के विकल्प के रूप में. उन्होंने आगाह किया कि यदि एआई को अदालत के मुख्य फैसले या रिट याचिकाएं लिखने की छूट दी जाती है, तो इससे गंभीर कानूनी जोखिम पैदा हो सकते हैं, क्योंकि एआई प्रणालियां कभी-कभी ऐसे कानूनों या संदर्भों का उल्लेख कर सकती हैं जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं हैं.
नीति के मसौदे को तैयार करने में शामिल संयुक्त सचिव अमित उप्रेती ने भी इस बात पर जोर दिया कि मानवीय सोच और कानूनी प्रावधानों के सटीक अनुप्रयोग में एआई का दखल पूरी तरह अनुचित है, इसलिए शुरुआती ध्यान सिर्फ कानूनी रिसर्च को बेहतर बनाने पर केंद्रित किया गया है.
इस नई डिजिटल पहल को सुचारू रूप से लागू करने के लिए नीति के क्लॉज 5.2 के तहत एआई को चरणबद्ध तरीके से पेश किया जाएगा. इसके साथ ही न्यायाधीशों, अदालती अधिकारियों, नेपाल बार एसोसिएशन के सदस्यों, सरकारी वकीलों और आम उपयोगकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण तथा जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे ताकि वे एआई के लाभ और इसके संभावित तकनीकी खतरों को अच्छी तरह समझ सकें.
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार शर्मा ने भी इस नीति को न्यायपालिका के इतिहास में एक मील का पत्थर बताया है. हालांकि, नीति में इस बात को भी स्वीकार किया गया है कि देश में सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली, कुशल जनशक्ति और संबंधित संस्थागत क्षमता को मजबूत करने के लिए अभी एक दीर्घकालिक डिजिटल बुनियादी ढांचे की रणनीति तैयार करना बाकी है, जिसके लिए सरकार, निजी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय विकास भागीदारों के साथ सहयोग का दायरा बढ़ाया जाएगा.