NDA सहयोगी TDP 'वीबी-जी राम जी' से संतुष्ट नहीं
नई दिल्ली । डेस्क: केंद्र की भाजपा-नीत एनडीए सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मनरेगा को बदलने का प्रयास अब घर में ही घमासान मचा रहा है. विपक्षी दलों के अलावा, एनडीए की प्रमुख सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी ने भी 'विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण)' या 'वीबी-जी राम जी' बिल 2025 का विरोध शुरू कर दिया है. आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी का कहना है कि यह बिल राज्यों पर आर्थिक बोझ थोप रहा है, खासकर वित्तीय संकट से जूझ रहे राज्यों के लिए.
दो दशक पुरानी मनरेगा योजना, जो यूपीए सरकार के दौर में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सुनिश्चित करने के लिए शुरू हुई थी, अब नए बिल के जरिए बदलाव के दायरे में है. सरकार का दावा है कि यह योजना को 'मजबूत' बनाने का कदम है, लेकिन विपक्ष इसे 'कमजोर करने' की साजिश बता रहा है.
कांग्रेस ने नाम बदलने पर सवाल उठाते हुए कहा कि मोदी सरकार महात्मा गांधी का नाम हटाकर 'जी राम जी' जोड़ रही है, जो गांधीजी के अंतिम शब्द 'हे राम' के प्रति उनकी आस्था का अपमान है. लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने कहा, "महात्मा गांधी के अंतिम शब्द 'हे राम' थे. क्या उनकी राम भक्ति पर कभी संदेह हुआ? उनके भजन ही इसका प्रमाण हैं. फिर मनरेगा से उनका नाम क्यों हटाया जा रहा है?"
मंगलवार को लोकसभा में कांग्रेस की प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी जोरदार हमला बोला. उन्होंने कहा कि मनरेगा में काम की मांग पर आधारित फंडिंग होती थी, जो पंचायत स्तर पर ग्राम सभाओं को सशक्त बनाती थी. लेकिन नए बिल में यह प्रावधान खत्म हो रहा है.
केंद्र अब पहले से फंड आवंटित करेगा, जिससे ग्रामीण परिवारों को सिर्फ तय क्षेत्रों में ही काम मिलेगा. प्रियंका ने चेतावनी दी कि इससे ग्राम सभाओं की निर्णय लेने की शक्ति कमजोर हो जाएगी और स्थानीय जरूरतें अनदेखी रहेंगी.
तृणमूल कांग्रेस भी मुखर है. राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने नाम बदलाव को सरकार की 'राजनीतिक चाल' बताया. वहीं, सीपीआई(एम) के महासचिव एम.ए. बेबी ने 'द हिंदू' को कहा, "अब जिम्मेदारी राज्यों पर डाली जा रही है. केंद्र कम फंड देकर विपक्षी राज्यों को सजा दे सकता है." केरल में सीपीएम-नीत एलडीएफ सत्ता में है, इसलिए यह चिंता जायज लग रही है.
नए बिल के प्रमुख बदलाव क्या हैं? वर्तमान मनरेगा में केंद्र-राज्य फंडिंग का अनुपात मजदूरी और सामग्री के लिए 90:10 है. लेकिन 'वीबी-जी राम जी' में सामान्य राज्यों के लिए यह 60:40 हो जाएगा (उत्तर-पूर्वी और पहाड़ी राज्यों के लिए 90:10 ही रहेगा). काम के दिनों की गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है, लेकिन योजना अब बजट-आधारित हो जाएगी, न कि मांग-आधारित.
फसल सीजन में दो महीने के लिए योजना रोकने का प्रावधान भी है, ताकि कृषि श्रमिक उपलब्ध रहें. सरकार का तर्क है कि इससे खर्च पर काबू रहेगा, लेकिन आलोचक कहते हैं कि इससे राज्यों की लचीलापन कम होगा.
एनडीए की 'मुख्य सहयोगी' टीडीपी ने 'द इकोनॉमिक टाइम्स' को बताया कि यह फंडिंग मॉडल राज्यों पर 'स्पष्ट बोझ' डालेगा. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा, "यह ग्रामीण रोजगार को किसी साधारण केंद्रीय योजना जैसा बना देगा. आंध्र जैसे संकटग्रस्त राज्य के लिए चिंताजनक है."
गौरतलब है कि टीडीपी के 16 लोकसभा सांसद हैं, जो एनडीए में भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी ताकत है. सूत्रों के अनुसार, पार्टी बिल को संसदीय स्थायी समिति में भेजने की मांग करेगी.
भाजपा ने बचाव में कहा कि मनरेगा में 'संरचनात्मक खामियां' थीं. पार्टी के आधिकारिक एक्स हैंडल से पोस्ट: "यह सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि मजबूत ढांचे का पुनर्गठन है." लेकिन टीडीपी जैसे सहयोगी के विरोध से सरकार को बिल पर बहस के लिए समिति गठित करने पर विचार करना पड़ सकता है.
विपक्षी दलों ने इसे 'मोदी सरकार की हताशा' बताया है, जबकि एनडीए के घर में ही दरार साफ नजर आ रही है. क्या यह बिल संसद से पास होगा? आने वाले दिनों में हंगामा और तेज होने के आसार हैं.