कुत्ते ने मिड-डे मील चाटा, छात्रों को 25 हज़ार मुआवजा दे सरकार-हाईकोर्ट
बिलासपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सरकारी मिडिल स्कूल, लच्छनपुर के उन सभी छात्रों को ₹25,000 का मुआवज़ा दिया जाए जिन्होंने वह मिड-डे मील खाया था जिसे कथित तौर पर कुत्ते ने चाट लिया था.
अदालत ने इस मामले में 3 अगस्त को प्रकाशित एक हिंदी दैनिक की रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लिया था. रिपोर्ट में कहा गया था कि एक स्वयं-सहायता समूह (SHG) ने बच्चों को कुत्ते द्वारा दूषित भोजन परोसा.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने टिप्पणी की- “चूंकि यह सरकारी संस्थान था और मिड-डे मील उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी स्वयं-सहायता समूह को दी गई थी, लेकिन भोजन कुत्ते से दूषित हो गया और बच्चों के उपभोग योग्य नहीं था. हालाँकि 84 बच्चों को तीन-तीन डोज़ एंटी-रेबीज़ दी गईं, फिर भी राज्य का यह दायित्व था कि बच्चों को परोसा जाने वाला भोजन सुरक्षित और स्वच्छ हो. यह लापरवाही है और इसलिए उचित होगा कि प्रत्येक प्रभावित छात्र को ₹25,000 एक महीने के भीतर दिया जाए.”
अदालत को बताया गया कि घटना की जाँच के लिए बनाए गए दो-सदस्यीय समिति (SDO राजस्व और BEO) की रिपोर्ट में पाया गया कि संबंधित SHG को मिड-डे मील वितरण से हटाने के साथ-साथ भविष्य की सभी सरकारी योजनाओं से भी वंचित कर दिया गया है.
इसके अलावा, प्रभारी प्राचार्य, क्लस्टर प्राचार्य, प्रभारी प्रधानाध्यापक, शिक्षक और क्लस्टर समन्वयक को निलंबित किया गया. शिक्षा निदेशक ने तीन शिक्षकों पर लघु दंड भी लगाया.
बलौदाबाजार कलेक्टर ने स्कूलों में मिड-डे मील की तैयारी और वितरण को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए, जिनमें शामिल हैं-रसोई शेड की बाड़बंदी, हफ्ते में दो बार ब्लीचिंग पाउडर का उपयोग, भोजन सामग्री की गुणवत्ता जाँच, बच्चों के हाथ अनिवार्य रूप से धुलवाना, अभिभावकों को भोजन की तैयारी व वितरण देखने के लिए शामिल करना और गुणवत्ताहीन भोजन परोसने वाले SHG पर कार्रवाई.
इसके साथ ही स्कूल शिक्षा निदेशालय ने प्रदेशभर में सभी ज़िला शिक्षा अधिकारियों को सफ़ाई, भोजन की गुणवत्ता जाँच और प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना के तहत निर्धारित मानकों के पालन के निर्देश जारी किए.
राज्य सरकार ने यह भी बताया कि उसने आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए खाद्य सामग्री की कीमतें संशोधित करने हेतु केंद्र से अनुरोध किया था, लेकिन सात महीने बीत जाने के बावजूद जवाब नहीं मिला. इसके चलते कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिव को भी मामले में पक्षकार बनाया और एक हफ़्ते में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया.