वैवाहिक बलात्कार: क्या पति पर दर्ज हो सकता है केस? SC का सवाल
नई दिल्ली । डेस्क: देश में वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) को अपराध घोषित करने से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद गंभीर और नीतिगत सवाल खड़ा किया है. अदालत ने कहा कि यद्यपि विवाहित महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षा और उनकी व्यक्तिगत स्वायत्तता सर्वोपरि है, लेकिन जब तक वर्तमान कानून में पतियों को दुष्कर्म के मामलों में वैधानिक छूट (एक्सेप्शन) हासिल है, तब तक अदालतों द्वारा उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का निर्देश देना किस हद तक सही है.
कानून की मौजूदा स्थिति और अदालत की दुविधा
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 का दूसरा अपवाद और नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 पतियों को वैवाहिक बलात्कार के आरोपों से स्पष्ट संरक्षण प्रदान करती है. नई संहिता के तहत पत्नी की आयु सीमा को 15 से बढ़ाकर 18 वर्ष किया गया है, लेकिन अपवाद को यथावत रखा गया है.
अदालत का कहना था कि भले ही कानून सही हो या गलत, जब तक किसी संवैधानिक पीठ द्वारा इस छूट को असंवैधानिक या अमान्य घोषित नहीं कर दिया जाता, तब तक कानून की वर्तमान स्थिति के तहत अभियोजन चलाने की अनुमति देना जटिल कानूनी प्रश्न खड़े करता है.
कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश पर सवाल
यह पूरा मामला मुख्य रूप से कर्नाटक उच्च न्यायालय के 2022 के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा है, जिसमें एक पति पर अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती करने के आरोप में दुष्कर्म का मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी.
कर्नाटक हाईकोर्ट ने उस समय टिप्पणी की थी कि "एक कृत्य केवल कृत्य होता है और बलात्कार केवल बलात्कार है, चाहे वह पति द्वारा अपनी पत्नी के खिलाफ ही क्यों न किया गया हो." सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क पर सवाल उठाते हुए विचार प्रस्तुत किया कि जब तक कानून में स्पष्ट छूट मौजूद है, क्या कोई अदालत विधायिका के क्षेत्राधिकार में प्रवेश करके आपराधिक केस दर्ज करने का आदेश दे सकती है?
पीड़िता के अधिकार बनाम केंद्र सरकार का पक्ष
सुनवाई के दौरान पत्नी का पक्ष रख रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि मौजूदा कानूनों की इस तरह से व्याख्या की जानी चाहिए जिससे पीड़िता को न्याय मिल सके. उनका कहना था कि महिला के साथ अत्यधिक क्रूरता की गई है, इसलिए अपवाद के बावजूद पति पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए.
दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मौजूदा छूट का समर्थन किया. केंद्र सरकार ने इस मामले में पहले भी यह रुख अपनाया है कि वैवाहिक बलात्कार को पूरी तरह से अपराध घोषित करने से वैवाहिक संबंधों और शादी जैसी सामाजिक संस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
फिलहाल शीर्ष अदालत इस महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर कर्नाटक मामले की सुनवाई के साथ-साथ अन्य संबंधित याचिकाओं पर भी विचार कर रही है.