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'माकन' की वो खाली कब्र और एक मां का अधूरा इंतजार

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24 अप्रै. 2026, 06:43 AM 5 मिनट में पढ़ें 1

माकन
माकन

तेहरान । डेस्क: तेहरान टाइम्स के हवाले से खबर है कि ईरान के मीनाब में शजरेह तैयबा प्राथमिक विद्यालय पर हुआ अमेरिकी हमला इतिहास के सबसे क्रूरतम अध्यायों में से एक के रूप में दर्ज हो गया है. इस हमले ने न केवल 168 मासूम जिंदगियों को निगल लिया, बल्कि पीछे छोड़ गया है कभी न खत्म होने वाला दर्द और न्याय की गूंज.


युद्ध की विभीषिका अक्सर आंकड़ों में सिमट कर रह जाती है, लेकिन मीनाब के शजरेह तैयबा प्राथमिक विद्यालय पर हुए अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल हमले ने दुनिया को वह चेहरा दिखाया है जिसे शब्दों में बयान करना असंभव है. 28 फरवरी का वह दिन, जो किसी भी सामान्य स्कूली दिन की तरह शुरू हुआ था, अचानक एक ऐसी त्रासदी में बदल गया जिसने मानवता को झकझोर कर रख दिया.


सुबह के 11:16 बजे जब बच्चे अपनी कक्षाओं में भविष्य के सपने बुन रहे थे, तभी आसमान से बरसी मौत ने सब कुछ राख कर दिया. इस हमले में सात से बारह वर्ष की 168 छात्राएं और छात्र शहीद हो गए. मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके स्कूल से जो दृश्य सामने आए, उन्होंने दुनिया भर के लोगों की रूह कंपा दी.


इस पूरी त्रासदी का सबसे मार्मिक चेहरा सात वर्षीय मासूम 'माकन' बनकर उभरा है. माकन उन अभागे बच्चों में से है जिसका शरीर हमले की तीव्रता के कारण पूरी तरह लुप्त हो गया. आज 46 दिन बीत जाने के बाद भी माकन के माता-पिता के पास अपने बेटे की याद के तौर पर केवल एक फटी हुई नीली स्वेटर और क्रीम रंग के जूतों की एक जोड़ी बची है.


मीनाब के शहीदों के कब्रिस्तान में माकन की एक खाली कब्र बनाई गई है, जो इस बात का गवाह है कि युद्ध की आग किस तरह मासूमों का अस्तित्व तक मिटा देती है. माकन की मां आसियेह राहीनेजाद के लिए वह सुबह आज भी उनके जेहन में ठहरी हुई है, जब स्कूल की शिक्षिका का फोन आया था और उसके कुछ ही पलों बाद एक भयानक विस्फोट ने उनके संसार को उजाड़ दिया.


मलबे में तलाश और अपनों का बिखरता शरीर


मलबे के नीचे अपनों को तलाशने का मंजर किसी दोजख से कम नहीं था. माकन के चाचा हमजेह राहीनेजाद बताते हैं कि हमले के बाद स्कूल परिसर धुएं, धूल और जलते हुए शरीरों की गंध से भरा हुआ था. 38 दिनों तक परिवार के बीस सदस्यों की टीम ने स्कूल के कोने-कोने और पास के जंगलों तक में माकन की तलाश की. वे मलबे से मांस के टुकड़ों और उंगलियों को इस उम्मीद में इकट्ठा करते रहे कि शायद कहीं माकन का कोई निशान मिल जाए. माकन के शरीर पर एक खास जन्मचिह्न था, जिसे उसके परिजन पागलों की तरह ढूंढ रहे थे, लेकिन अंत में उन्हें केवल एक जूता और खून से सनी स्वेटर ही मिली. यह स्थिति किसी भी माता-पिता के लिए प्रलय से कम नहीं थी.


राष्ट्रीय आक्रोश और प्रतिशोध की मांग


ईरान के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस हमले की तीखी प्रतिक्रिया हुई है. सरकारी प्रवक्ता फातिमे मोहजेरानी ने सोशल मीडिया पर माकन की कहानी साझा करते हुए इसे मानवाधिकारों और बच्चों के अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन करार दिया है.


उन्होंने जोर देकर कहा कि एक स्कूल पर हमला कोई गलती नहीं बल्कि एक जघन्य अपराध है. ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी के प्रमुख पीरहुसैन कोलिवंद ने तो यहाँ तक कहा कि गाजा में जारी संघर्ष के दौरान भी एक साथ इतनी बड़ी संख्या में छात्रों की मौत की ऐसी मिसाल नहीं मिलती.


इस घटना ने पूरे ईरान में शोक और गुस्से की लहर पैदा कर दी है, जहाँ पीड़ित परिवारों की एकमात्र मांग अब न्याय और इस नरसंहार का प्रतिशोध है.


अंतरराष्ट्रीय निंदा और मलाला का संदेश


संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक और शैक्षिक एजेंसी यूनेस्को ने भी इस हमले की कड़े शब्दों में निंदा की है. यूनेस्को के अनुसार, शिक्षा के लिए समर्पित स्थानों पर हमला करना अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत दिए गए संरक्षण का गंभीर उल्लंघन है.


नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ने भी इस त्रासदी पर गहरा दुख व्यक्त किया है. उन्होंने कहा कि वे लड़कियां जो अपने भविष्य के सपने लेकर स्कूल गई थीं, उनकी जान इतनी बेरहमी से लेना पूरी तरह से अक्षम्य है.


मलाला ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आह्वान किया कि स्कूलों और नागरिकों को निशाना बनाने वाली इस हिंसा को तुरंत रोका जाना चाहिए और दोषियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए.


युद्ध अपराध और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि शजरेह तैयबा स्कूल पर हुआ यह हमला चौथे जिनेवा कन्वेंशन और अतिरिक्त प्रोटोकॉल का सीधा उल्लंघन है, जो युद्ध के समय नागरिकों और विशेष रूप से स्कूलों को सुरक्षा प्रदान करते हैं.


अंतरराष्ट्रीय कानून स्पष्ट है कि भले ही युद्ध की स्थिति हो, लेकिन शैक्षणिक संस्थानों को निशाना बनाना एक युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कई प्रस्तावों में भी यह दोहराया गया है कि बच्चों पर हमले किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हैं.


मीनाब की यह घटना दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि आखिर कब तक मासूमों को 'कोलेटरल डैमेज' के नाम पर अपनी जान गंवानी पड़ेगी.


खाली कब्र और कभी न खत्म होने वाला इंतजार


आज माकन की यादें एक मस्जिद के कांच के बक्से में बंद हैं. उसकी मां अक्सर उस खाली कब्र के पास जाकर बैठती हैं, जहाँ उनके बेटे का शरीर तो नहीं है, लेकिन उसकी मौजूदगी का अहसास हर पल उन्हें तड़पाता है. यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि उन 168 परिवारों का साझा दर्द है जिन्होंने अपने जिगर के टुकड़ों को खो दिया है.


मीनाब का यह स्कूल अब केवल मलबे का ढेर नहीं, बल्कि उन अधूरे सपनों का कब्रिस्तान बन गया है जो एक सुबह मिसाइल की गड़गड़ाहट में दफन हो गए.


दुनिया अब देख रही है कि क्या अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली इन मासूमों को इंसाफ दिला पाएगी या माकन की खाली कब्र आने वाली पीढ़ियों को केवल युद्ध की क्रूरता की याद दिलाती रहेगी.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP