भूपेश बघेल को सुप्रीम झटका: 2023 चुनाव की निष्पक्षता पर HC में चलेगा केस
नई दिल्ली । डेस्क: छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा कानूनी झटका लगा है. शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को बघेल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में पाटन सीट से अपनी जीत को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका को शुरुआती स्तर पर ही रद्द करने की मांग की थी. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह बड़ी राहत और छूट भी दी है कि वे हाईकोर्ट के समक्ष ट्रायल के दौरान अपनी सभी कानूनी और तथ्यात्मक आपत्तियां उठाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र रहेंगे.
यह फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनाया. अदालत भूपेश बघेल द्वारा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हाईकोर्ट ने भाजपा नेता विजय बघेल की ओर से दाखिल चुनाव याचिका की मेंटेनेबिलिटी को चुनौती देने वाले भूपेश बघेल के आवेदन को खारिज कर दिया था.
पूरा विवाद 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान पाटन सीट पर हुए प्रचार से जुड़ा है. दुर्ग से भाजपा सांसद विजय बघेल ने चुनाव याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि भूपेश बघेल ने मतदान से ठीक 48 घंटे पहले लागू होने वाली साइलेंस पीरियड का उल्लंघन करते हुए 16 नवंबर 2023 को एक रोड शो आयोजित किया था. विजय बघेल का दावा है कि यह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 का सीधा उल्लंघन है और इसने चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया.
सुप्रीम कोर्ट में भूपेश बघेल की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जोरदार बहस की. उन्होंने अदालत के सामने तर्क दिया कि अगर लगाए गए आरोपों को थोड़ी देर के लिए सही मान भी लिया जाए, तब भी यह केवल धारा 126 के तहत एक चुनावी अपराध बनता है, न कि धारा 123 के तहत कोई 'भ्रष्ट आचरण'. सिब्बल ने अदालत से कहा कि धारा 126 एक चुनावी अपराध की श्रेणी में आता है, जबकि भ्रष्ट आचरण का दायरा धारा 123 में तय किया गया है.
सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि इस कथित घटना का चुनाव के अंतिम नतीजों पर कोई वास्तविक असर नहीं पड़ा है. उन्होंने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि भूपेश बघेल ने अपने प्रतिद्वंद्वी को करीब 20,000 वोटों के बड़े अंतर से हराया था. सिब्बल ने कहा कि जिस कार्यक्रम का जिक्र किया जा रहा है, उसमें महज 200 लोग शामिल थे और तात्कालीन मुख्यमंत्री होने के नाते उनके साथ Z+ सुरक्षा का अमला मौजूद था.
इसलिए, जब मामला भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता ही नहीं है, तो पूर्व मुख्यमंत्री को एक लंबी और जटिल अदालती सुनवाई से गुजारना न्यायसंगत नहीं होगा.
हालांकि, पीठ में शामिल न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने इस तर्क पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कथित उल्लंघन का चुनाव परिणाम पर असर पड़ा या नहीं, यह एक ऐसा पहलू है जिसका फैसला केवल साक्ष्यों और सबूतों के आधार पर ही किया जा सकता है. उन्होंने सवाल उठाया कि 200 लोगों की उपस्थिति वाली बैठक गुप्त थी या सार्वजनिक और इसका प्रभाव कितना फैला, यह जांच और सबूत का विषय है.
जब सिब्बल ने केस को शुरुआती स्तर पर ही खत्म करने का आग्रह किया, तो न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री के पास हाईकोर्ट में अपना बचाव करने के लिए एक मजबूत और तर्कसंगत आधार मौजूद है.
शीर्ष अदालत ने अंततः हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी भूपेश बघेल की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि चुनाव याचिका विचारणीय है.
भूपेश बघेल ने अपनी दलीलों में यह भी कहा था कि चुनाव याचिका में आवश्यक तथ्यों की कमी है, धारा 83(1)(सी) के तहत सही हलफनामा नहीं दिया गया है और धारा 65-बी का प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत नहीं किया गया है. अब सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद पूर्व मुख्यमंत्री को अपनी इन सभी आपत्तियों को हाईकोर्ट के समक्ष ट्रायल के दौरान ही साबित करना होगा.