भारत के बड़े धार्मिक हादसे, जिससे पूरा देश हिल गया
नई दिल्ली । डेस्क: भारत अपनी समृद्ध आध्यात्मिक परंपराओं और भव्य तीर्थयात्राओं के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. लेकिन समय-समय पर धार्मिक आयोजनों में होने वाली त्रासदियों ने इन पावन अवसरों को मातम में बदल दिया है. हाल ही में ओडिशा के पुरी में आयोजित जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान मची भगदड़ में 2 श्रद्धालु की मौत और 200 लोगों के अस्पताल पहुंचने की घटना ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
देश में धार्मिक आयोजनों पर होने वाले हादसों का इतिहास दशकों पुराना है. साल 2005 में महाराष्ट्र के मंधारदेवी मंदिर में हुई त्रासदी से लेकर हाल के वर्षों में हुए हादसों तक, सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन में कमियां हमेशा भारी पड़ी हैं.
यहाँ भारत के इतिहास के उन सबसे बड़े और दर्दनाक धार्मिक हादसों की सूची दी गई है, जिन्होंने पूरे देश को रुला दिया:
1. महाकुंभ मेला, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश (2025)
साल 2025 में प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ के दौरान संगम नोज की तरफ अचानक श्रद्धालुओं का भारी रेला उमड़ पड़ा. भीड़ के अत्यधिक दबाव के कारण सुरक्षा बैरिकेड्स टूट गए और वहां भगदड़ मच गई.
नुकसान: सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस हादसे में 30 लोगों की मौत और 60 लोग घायल हुए. हालांकि, बीबीसी और न्यूज़लॉन्ड्री जैसी स्वतंत्र मीडिया रिपोर्ट्स में मृतक संख्या 79 से 82 के बीच बताई गई.
2. हाथरस सत्संग भगदड़, उत्तर प्रदेश (2024)
उत्तर प्रदेश के हाथरस में स्वयंभू संत 'भोले बाबा' (नारायण साकार हरि) के एक सत्संग (प्रार्थना सभा) के समापन पर भीषण भगदड़ मच गई. विशेषज्ञों ने इस हादसे के लिए आयोजकों की खराब तैयारियों और स्थानीय प्रशासन की अनुभवहीनता को जिम्मेदार ठहराया था.
नुकसान: इस दर्दनाक हादसे में महिलाओं और बच्चों समेत 121 से अधिक लोगों की जान चली गई.
3. रतनगढ़ मंदिर हादसा, मध्य प्रदेश (2013)
दतिया जिले में नवरात्र के अंतिम दिन सिंध नदी के पुल को पार कर रहे करीब 5 लाख श्रद्धालुओं के बीच एक अफवाह फैल गई कि पुल टूटने वाला है. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस द्वारा बल प्रयोग किए जाने से अफरा-तफरी और बढ़ गई.
नुकसान: अफवाह और घबराहट के कारण मची इस भगदड़ में 115 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी, जिनमें से कई लोगों ने जान बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी थी.
4. सबरीमाला मंदिर त्रासदी, केरल (2011)
केरल के पुल्लुमेदु में मकरज्योति के दर्शन कर लौट रहे करीब 1 लाख से अधिक श्रद्धालु एक संकरे और पथरीले जंगली रास्ते पर जमा थे. इसी दौरान एक अनियंत्रित जीप पीछे की ओर लुढ़क गई, जिससे वहां रास्ता बंद हो गया और घबराहट फैल गई.
नुकसान: इस भीषण हादसे और भगदड़ में 106 श्रद्धालुओं की मौत हो गई और लगभग 100 अन्य घायल हुए.
5. राम जानकी मंदिर हादसा, उत्तर प्रदेश (2010)
प्रतापगढ़ के कुंडा स्थित एक आश्रम में मुफ्त भोजन, कपड़े और बर्तन वितरण के एक धर्मार्थ कार्यक्रम के दौरान यह हादसा हुआ. आश्रम में करीब 10,000 लोगों की भारी भीड़ जमा थी, जो प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार की तरफ बढ़ी.
नुकसान: भीड़ के अत्यधिक दबाव के कारण मंदिर के निर्माणाधीन कंक्रीट के गेट ढह गए, जिससे दबने और मची भगदड़ में 63 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई.
6. चामुंडा देवी मंदिर भगदड़, राजस्थान (2008)
जोधपुर के मेहरानगढ़ किले की खड़ी ढलानों पर स्थित चामुंडा देवी मंदिर में नवरात्र के पहले दिन तड़के सुबह जैसे ही मंदिर के कपाट खुले, श्रद्धालुओं में आगे बढ़ने की होड़ मच गई. ढलान पर पैर फिसलने और बैरिकेड्स टूटने से लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरते चले गए.
नुकसान: इस हादसे में 250 श्रद्धालुओं की कुचलने से मौत हो गई थी.
7. नैना देवी मंदिर हादसा, हिमाचल प्रदेश (2008)
बिलासपुर जिले में स्थित प्रसिद्ध नैना देवी मंदिर के संकरे पहाड़ी रास्ते पर भारी भीड़ जमा थी. इसी दौरान बारिश से बचने के लिए बनाए गए एक शेल्टर के ढहने से भूस्खलन होने की अफवाह फैल गई, जिससे ऊपर चढ़ रहे और नीचे उतर रहे श्रद्धालुओं में भगदड़ मच गई.
नुकसान: इस अफवाह के कारण मचे हाहाकार में 162 लोगों ने अपनी जान गंवा दी.
8. मंधारदेवी मंदिर भगदड़, महाराष्ट्र (2005)
सतारा जिले के वाई में स्थित इस मंदिर के संकरे परिसर में क्षमता से कहीं अधिक भीड़ जमा थी, जबकि सुरक्षा के लिए केवल 30 पुलिसकर्मी तैनात थे. नारियल पानी और बकरे के खून के कारण मंदिर की सीढ़ियां बेहद फिसलन भरी हो गई थीं, जिस पर श्रद्धालुओं के फिसलने से भगदड़ मची और बाद में वहां भीषण आग भी लग गई.
नुकसान: सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस हादसे में 251 लोगों की मौत हुई थी (जिसमें 157 महिलाएं और 5 बच्चे शामिल थे), हालांकि स्थानीय अनुमानों में यह संख्या कहीं अधिक बताई गई थी.
9. नासिक कुंभ मेला, महाराष्ट्र (2003)
नासिक कुंभ मेले के दौरान संकरी गलियों में बैरिकेडिंग के बीच करीब 30,000 श्रद्धालु मौजूद थे. तभी एक साधु द्वारा श्रद्धालुओं की तरफ चांदी के सिक्के फेंके जाने के बाद सिक्के बटोरने की होड़ मच गई, जिससे वहां हिंसक अफरा-तफरी फैल गई.
नुकसान: इस अचानक मची भगदड़ में 39 श्रद्धालुओं की मौत हुई और 140 से अधिक लोग घायल हुए.
10. कुंभ मेला, हरिद्वार, उत्तराखंड (1986)
हरिद्वार में गंगा स्नान के बाद लौट रहे श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बीच पंत द्वीप क्षेत्र के पास अचानक आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया गया. वीआईपी और राजनेताओं के स्नान के लिए हर-की-पौड़ी के रास्ते रोके जाने से घंटों तक भीड़ जमा होती रही और अंततः भगदड़ में बदल गई.
नुकसान: इस हादसे में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 46 लोगों की मौत हुई थी.
11. कुंभ मेला, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश (1954) - देश का सबसे भीषण हादसा
यह आज़ाद भारत के इतिहास की सबसे भयावह और बड़ी भगदड़ थी. मौनी अमावस्या के मुख्य स्नान के दिन गंगा की धारा बदलने, वीआईपी मूवमेंट (जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद शामिल थे) और सुरक्षा बैरिकेड्स टूटने के कारण अनियंत्रित भीड़ आपस में कुचल गई.
नुकसान: इस महा-त्रासदी में लगभग 800 लोगों की मौत हुई थी और 2,000 से अधिक लोग घायल हुए थे.
बदलाव की नींव: इस हादसे के बाद जस्टिस कमला कांत वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था, जिसकी सिफारिशों ने भारत में बड़े आयोजनों में भीड़ प्रबंधन की पूरी रूपरेखा को बदल दिया.
चिंता का विषय: क्या हमने सीख ली?
कोविड-19 महामारी के बाद भी धार्मिक स्थलों पर हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. जनवरी 2022 में जम्मू-कश्मीर के माता वैष्णो देवी मंदिर में मची भगदड़ में 12 लोगों की जान गई, तो वहीं मार्च 2023 में इंदौर के एक मंदिर में रामनवमी पर बावड़ी की छत धंसने से 36 श्रद्धालुओं की मौत हो गई.
इन निरंतर हो रही घटनाओं और हाल ही में पुरी रथ यात्रा में हुए हादसे से स्पष्ट है कि धार्मिक पर्यटन और आस्था के इन बड़े केंद्रों पर सुरक्षा, तकनीकी निगरानी और वैज्ञानिक भीड़ प्रबंधन को और अधिक मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है.