बंगाल चुनाव पलायन से प्रभावित भारत के बड़े शहर
नई दिल्ली । डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहा भीषण चुनावी संघर्ष केवल कोलकाता या सिलीगुड़ी की सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा और गहरा असर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और गुरुग्राम जैसे महानगरों के ड्राइंग रूम तक पहुंच चुका है. "बंगाल चुनाव पलायन से प्रभावित भारत के बड़े शहर" आज की वह कड़वी हकीकत है, जिसने आधुनिक शहरी जीवन की रफ्तार पर अचानक ब्रेक लगा दिया है.
जैसे-जैसे बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सत्ता की जंग तेज हुई है, वैसे-वैसे देश के प्रमुख आर्थिक केंद्रों से कामगारों का एक बड़ा हुजूम अपने गृह राज्य की ओर लौट गया है. यह पलायन इतना व्यापक है कि इसने भारत के एलीट क्लास और मध्यम वर्ग को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उनका आलीशान जीवन असल में किन कंधों पर टिका हुआ है.
गुरुग्राम की पॉश सोसायटियों से लेकर नोएडा के ऊंचे अपार्टमेंट्स तक, हर तरफ एक ही चर्चा है कि आखिर घर के सहायक, रसोइये और ड्राइवर कहां चले गए? इसका जवाब बंगाल के उन मतदान केंद्रों में छिपा है, जहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराना इन प्रवासियों के लिए अब केवल लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, बल्कि वजूद की लड़ाई बन गया है. शहरों में बर्तन धोने से लेकर सफाई करने तक का काम करने वाले इन लोगों का अचानक गायब होना किसी 'महानगर संकट' से कम नहीं है.
सोशल मीडिया पर लोग अपनी परेशानी साझा कर रहे हैं कि कैसे घरेलू सहायकों के बिना उनके घर किसी खाली घोंसले की तरह महसूस हो रहे हैं. लेकिन यह मुद्दा केवल घरेलू असुविधा का नहीं है; यह उस अदृश्य श्रम शक्ति के महत्व को उजागर करता है जो भारतीय शहरों को चलाती है.
इस पलायन के पीछे एक बड़ा कारण मतदाता सूची का 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' यानी गहन संशोधन कार्य है. बंगाल के दूर-दराज के गांवों से आकर शहरों में बसने वाले इन लोगों के मन में यह गहरा डर बैठ गया है कि यदि वे समय पर घर नहीं पहुंचे, तो उनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया जाएगा. उनके लिए मतदाता सूची से बाहर होने का मतलब केवल वोट देने के अधिकार से वंचित होना नहीं है, बल्कि सरकारी राशन, भूमि अधिकार और अन्य कल्याणकारी योजनाओं से हाथ धोना भी हो सकता है.
इसीलिए, हजारों की संख्या में लोग अपनी मेहनत की कमाई हवाई टिकटों और लंबी रेल यात्राओं पर खर्च कर वापस लौट रहे हैं. राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं कि मतदाताओं को डराकर या प्रलोभन देकर वापस बुलाया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह 'पहचान' को सुरक्षित रखने की एक सामूहिक व्याकुलता है.
महानगरों में इस श्रम संकट ने तकनीक और बाजार के नए समीकरण पैदा कर दिए हैं. अर्बन कंपनी जैसे सर्विस ऐप्स पर बुकिंग मिलना अब किसी लॉटरी जीतने जैसा हो गया है. लोग वैक्यूम क्लीनर और डिशवॉशर जैसे उपकरणों पर निवेश कर रहे हैं, लेकिन फिर भी वे उस मानवीय श्रम की कमी को पूरा नहीं कर पा रहे हैं जो बंगाल से आता है. नोएडा के घेझा और भंगेल जैसे इलाके, जो कभी प्रवासी श्रमिकों की चहल-पहल से गुलजार रहते थे, अब सूने पड़े हैं.
यह स्थिति दर्शाती है कि भारत के बड़े शहरों का बुनियादी ढांचा कितना ज्यादा पश्चिम बंगाल से आने वाले श्रम पर निर्भर है. वरिष्ठ वकीलों और बुद्धिजीवियों का तर्क है कि यह एक 'सभ्यतागत त्रासदी' है कि जिस राज्य ने कभी भारत का नेतृत्व किया, आज वह केवल घरेलू सहायकों के सबसे बड़े निर्यातक के रूप में पहचाना जा रहा है.
राजनीतिक चश्मे से देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी के बीच का वाकयुद्ध इस पलायन को अलग-अलग रंग दे रहा है. जहां एक पक्ष इसे शासन की विफलता और डर का माहौल बता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे नागरिकता के अधिकारों पर हमला बताकर मतदाताओं को एकजुट कर रहा है.
इन सबके बीच, गुरुग्राम का वह सेवानिवृत्त व्यक्ति जो अब खुद घर के बर्तन मांज रहा है, या बेंगलुरु की वह कामकाजी महिला जो अपने ड्राइवर के लौटने का इंतजार कर रही है, वे सभी इस चुनावी आंच को महसूस कर रहे हैं.
यह घटनाक्रम यह भी याद दिलाता है कि भारत के महानगर भले ही कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएं, उनकी धड़कन आज भी उन दूरदराज के गांवों से आने वाले लोगों के हाथों में है, जिन्हें अक्सर हम तभी याद करते हैं जब वे हमारी पहुंच से दूर हो जाते हैं. बंगाल के चुनाव परिणाम जो भी हों, लेकिन इस व्यापक पलायन ने शहरी भारत को उसकी निर्भरता और सामाजिक ढांचे की हकीकत से रूबरू करा दिया है.