दिल्ली HC का बड़ा फैसला: आत्मनिर्भर जीवनसाथी को गुजारा भत्ता नहीं
नई दिल्ली । डेस्क: दिल्ली उच्च न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत गुजारा भत्ता (Alimony) की मांग को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है. जिसमें कहा गया है कि गुजारा भत्ता सामाजिक न्याय का एक उपाय है, न कि सक्षम और वित्तीय रूप से स्वतंत्र व्यक्तियों के लिए समृद्धि या वित्तीय समानता का साधन.
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने हाल ही में एक मामले में यह टिप्पणी की. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थायी गुजारा भत्ता मांगने वाले व्यक्ति को वित्तीय सहायता की वास्तविक आवश्यकता प्रदर्शित करनी होगी.
यह फैसला तब आया जब उच्च न्यायालय ने एक फैमिली कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा, जिसने एक महिला को गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया था और उसके पति को क्रूरता के आधार पर तलाक दे दिया था.
मामला और कोर्ट की टिप्पणी
यह मामला एक पेशेवर जोड़े का था-पति एक वकील और पत्नी भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) की ग्रुप 'ए' अधिकारी थीं. शादी के केवल 14 महीने बाद ही दोनों अलग हो गए थे. पति ने पत्नी पर मानसिक और शारीरिक क्रूरता के आरोप लगाए थे, जिसमें अपमानजनक भाषा और वैवाहिक अधिकारों से इनकार शामिल था.
फैमिली कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने तलाक पर सहमति देने के लिए 50 लाख रुपये के वित्तीय निपटान की मांग की थी, जिसे उसने क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान स्वीकार किया था. उच्च न्यायालय ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि अपीलकर्ता (पत्नी) का दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से एक वित्तीय आयाम लिए हुए था.
वित्तीय स्वतंत्रता पर ज़ोर
गुजारा भत्ता की याचिका को खारिज करते हुए, उच्च न्यायालय ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि महिला एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी थीं और उनकी आय पर्याप्त एवं स्वतंत्र थी.
कोर्ट ने कहा, "कम अवधि का सहवास, बच्चों की अनुपस्थिति, अपीलकर्ता की पर्याप्त और स्वतंत्र आय, और वित्तीय आवश्यकता के विश्वसनीय प्रमाण का अभाव सामूहिक रूप से स्थायी गुजारा भत्ता के किसी भी दावे को नकारते हैं."
न्यायाधीशों ने यह भी नोट किया कि पति या पत्नी के लिए वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर होने पर भी गुजारा भत्ता की मांग करना कानून का दुरुपयोग हो सकता है. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अदालतें उच्च-मूल्य के गुजारा भत्ता दावों की बारीकी से जांच कर रही हैं.
इससे पहले, भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई भी एक मामले में एक उच्च शिक्षित महिला के बड़े गुजारा भत्ता दावे पर टिप्पणी कर चुके हैं कि "आप इतनी पढ़ी-लिखी हैं, आपको खुद को मांगना नहीं चाहिए और खुद को कमा के खाना चाहिए."