महानदी जल विवाद: ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच बनी सहमति
भुवनेश्वर । डेस्क: ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच दशकों से चले आ रहे महानदी जल विवाद को सुलझाने की दिशा में एक बड़ी और ऐतिहासिक प्रगति हुई है. दोनों राज्यों की संयुक्त तकनीकी समिति (JTC) ने नदी के वार्षिक जल की उपलब्धता और उपज के सटीक आंकड़ों पर एक साझा राय कायम कर ली है. नई दिल्ली में महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (MWDT) के समक्ष पिछले दिनों हुई सुनवाई में ये आंकड़े पेश किए गए, जो इस विवाद के समाधान के लिए आधार का काम करेंगे.
संयुक्त तकनीकी समिति द्वारा निर्धारित आंकड़ों के अनुसार, ओडिशा के लिए वार्षिक जल की उपलब्धता 33.17 मिलियन एकड़ फीट (MAF) तय की गई है, जबकि छत्तीसगढ़ के लिए यह सीमा 28.94 MAF निर्धारित की गई है.
रिपोर्ट के अनुसार, महानदी बेसिन की कुल औसत वार्षिक जल उपलब्धता 62.36 MAF आंकी गई है. इसमें पश्चिमी जलग्रहण क्षेत्र और चिल्का जल निकाय का हिस्सा भी शामिल किया गया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह डेटा केवल कागजी नहीं है, बल्कि इसे 1980-81 से लेकर 2018-19 तक के दीर्घकालिक प्रवाह और वर्षा के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है. रिपोर्ट में विभिन्न 'निर्भरता स्तरों' का भी उल्लेख है, ताकि भविष्य में सूखे या कम बारिश की स्थिति में भी पानी के वितरण का स्पष्ट फॉर्मूला रहे.
उदाहरण के तौर पर, 90 प्रतिशत निर्भरता के स्तर पर (जब नदी में पानी कम हो) कुल उपलब्धता 37.25 MAF मानी जाएगी.
इस तकनीकी समझौते को दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ओडिशा के मोहन चरण माझी और छत्तीसगढ़ के विष्णु देव साय ने अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है. न्यायाधिकरण ने दोनों राज्यों के नेतृत्व द्वारा दिखाई गई इस परिपक्वता और गंभीरता की सराहना की है.
महानदी, जिसे दोनों राज्यों की 'जीवन रेखा' कहा जाता है, उसके जल वितरण पर बनी यह सहमति न केवल किसानों के लिए सिंचाई की राह आसान करेगी, बल्कि औद्योगिक और घरेलू जल आपूर्ति के संकट को भी खत्म करने में मददगार साबित होगी. अब उम्मीद जताई जा रही है कि न्यायाधिकरण इस डेटा के आधार पर जल्द ही अपना अंतिम फैसला सुना सकता है.
गौरतलब है कि महानदी जल विवाद मुख्य रूप से ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच नदी के पानी के उपयोग, भंडारण और नियंत्रण को लेकर एक लंबा कानूनी और राजनीतिक संघर्ष है. महानदी छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले से निकलती है और ओडिशा से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है, जिससे यह दोनों राज्यों की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए 'जीवन रेखा' बन जाती है.
विवाद की जड़ तब गहरी हुई जब छत्तीसगढ़ सरकार ने नदी के ऊपरी हिस्से में कई बैराज और बांधों का निर्माण शुरू किया. ओडिशा का तर्क है कि इन निर्माणों के कारण गैर-मानसूनी महीनों (सर्दियों और गर्मियों) में उसके क्षेत्र में पानी का प्रवाह काफी कम हो जाता है, जिससे हीराकुंड बांध की जल विद्युत क्षमता और राज्य की सिंचाई व्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है.
दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ का पक्ष है कि वह केवल अपने हिस्से के पानी का उपयोग कर रहा है और नदी का अधिकांश जल बिना उपयोग के समुद्र में बह जाता है. स्थिति तब और जटिल हो गई जब ओडिशा ने केंद्र सरकार से एक न्यायाधिकरण (Tribunal) के गठन की मांग की. लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 'महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण' (MWDT) का गठन किया गया.
हाल के घटनाक्रमों में, दोनों राज्यों ने पहली बार संयुक्त तकनीकी समिति के माध्यम से पानी की उपलब्धता के आंकड़ों पर सहमति जताई है. अब विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि मानसून के दौरान जमा किए गए पानी का बंटवारा कैसे हो और सूखे की स्थिति में दोनों राज्यों की हिस्सेदारी क्या रहे, ताकि पारिस्थितिकी और मानवीय आवश्यकताओं के बीच संतुलन बना रहे.